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सिलक्यारा सुरंग: 17 दिन की राहत, 17 माह की मेहनत से बन गई विकास की नई राह

 

उत्तरकाशी/देहरादून – उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित सिलक्यारा सुरंग एक बार फिर सुर्खियों में है। 12 नवंबर 2023 की वह तारीख जब दीपावली के दिन देश उत्सव में डूबा था, 41 मजदूरों की जान एक निर्माणाधीन सुरंग में फंस गई थी। 17 दिन तक चले रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद 28 नवंबर 2023 को सभी मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया था।

अब, 17 महीने बाद, उसी सिलक्यारा टनल ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है – सुरंग का दोनों सिरों से संपर्क स्थापित हो गया है। इससे गंगोत्री और यमुनोत्री धामों के बीच की दूरी में कमी आई है और आवाजाही अब पहले से आसान और तेज़ हो सकेगी।

क्या है सिलक्यारा टनल?

सिलक्यारा-ब्यांठी टनल राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-134) का हिस्सा है। यह सुरंग स्ट्रैटजिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि यह ऑल वेदर कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट का हिस्सा है जो चारधाम यात्रा को सुगम बनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा चलाया जा रहा है।

इस सुरंग की कुल लंबाई करीब 4.5 किलोमीटर है। यह ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड (NATM) से बनाई जा रही थी। परियोजना की निगरानी राष्ट्रीय राजमार्ग एवं अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड (NHIDCL) द्वारा की जा रही थी।

2023 की दुर्घटना और रेस्क्यू ऑपरेशन

12 नवंबर 2023 को सुरंग निर्माण के दौरान अंदर फंसी मिट्टी और चट्टानों के चलते 41 श्रमिक सुरंग में फंस गए थे। रेस्क्यू ऑपरेशन में NDRF, SDRF, BRO, ITBP, और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ अर्नोल्ड डिक्स की अहम भूमिका रही। लगातार 17 दिनों तक चले प्रयासों में मैनुअल बोरिंग से सुरंग में पाइप डालकर मजदूरों को सुरक्षित निकाला गया।

टनल का आर-पार होना: विकास की नई रेखा

17 अप्रैल 2025, बुधवार को इस सुरंग के दोनों छोर जुड़ गए, जिसे टनल की आर-पार सफलता कहा जा रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस ऐतिहासिक मौके पर खुद सिलक्यारा टनल पहुंचे और वहां पूजा अर्चना की। उन्होंने श्रमिकों की मेहनत को प्रणाम करते हुए कहा कि यह विकास और दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतीक है।मुख्यमंत्री ने बाबा बौखनाथ का भी आभार जताया, जिन्हें स्थानीय लोग इस अभियान के दौरान अदृश्य शक्ति मानते रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ अर्नोल्ड डिक्स भी इस सुरंग और इसमें हुई इंजीनियरिंग को एक मिसाल मानते हैं।

क्या बदलेगा अब?

  • गंगोत्री और यमुनोत्री के बीच की दूरी 25 से 30 किमी तक कम हो जाएगी।
  • चारधाम यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए समय और जोखिम दोनों में कमी आएगी।
  • रणनीतिक दृष्टिकोण से सेना और राहत कार्यों के लिए यह मार्ग अधिक विश्वसनीय और तेज़ बन जाएगा।

सिलक्यारा टनल न केवल उत्तराखंड के लिए बल्कि पूरे देश के लिए विश्वास, साहस और तकनीक का प्रतीक बन गई है। जहां एक समय यह सुरंग 41 जिंदगियों के लिए संकट बन गई थी, वहीं आज यह उजाले का रास्ता और विकास की धुरी बन चुकी है।

 

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