स्विट्ज़रलैंड

यूरोप में गूंजे उत्तराखंडी जागर, स्विट्ज़रलैंड के ज़्यूरिख में हुआ भव्य आयोजन

ज़्यूरिख (स्विट्ज़रलैंड): “Pritam Bharatwan International Geet Jagar Dhol Sagar European Tour” के अंतर्गत 28 दिसंबर 2025 को स्विट्ज़रलैंड के ज़्यूरिख शहर में उत्तराखंड एसोसिएशन ऑफ स्विट्ज़रलैंड के तत्वावधान में एक भव्य सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। इस शानदार कॉन्सर्ट में प्रवासी उत्तराखंडी भाई-बहनों ने पारंपरिक जागर और लोकगीतों का भरपूर आनंद लिया।

करीब 4 घंटे तक चले इस कार्यक्रम में उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति जीवंत रूप में दिखाई दी। जागर गायन के दौरान देवी-देवताओं का अवतरण हुआ, जिससे पूरा माहौल आध्यात्मिक और भावनात्मक हो गया। कार्यक्रम की शुरुआत विधिवत ढोल पूजा और तिलक के साथ की गई, इसके बाद कलाकारों का सम्मान भी किया गया।

कार्यक्रम में लगभग 300 दर्शक उपस्थित रहे।
इस दौरान “मै जान्दौ मेरी बसंती दूर देशु पार”, राजराजेश्वरी, भैरव, नरसिंह, नागराजा सहित कई देवी-देवताओं के जागर लगाए गए। इसके साथ ही कैमरा गीत, किमसाड़ी, हाट, सरूली जैसे सुपरहिट लोकगीतों की प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया और पूरे सभागार में तालियों की गूंज सुनाई दी।

दर्शकों ने कार्यक्रम को अत्यंत भावनात्मक और आनंददायक बताया। कई प्रवासी उत्तराखंडियों ने कहा कि इस तरह के आयोजनों से उन्हें अपने गांव, देवभूमि और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का अवसर मिलता है।

यूरोपीय टूर का अगला पड़ाव जर्मनी
यूरोपीय दौरे के इसी क्रम में आज जर्मनी के कौंसटेश शहर में कॉन्सर्ट आयोजित किया जा रहा है, जिसे लेकर प्रवासी उत्तराखंडियों में खासा उत्साह है।

इस अंतरराष्ट्रीय टूर में लोकगायक प्रीतम भरतवाण के साथ

  • लोकगायक सुरतम भरतवाण,

  • म्यूजिक डायरेक्टर सुरेन्द्र कोली,

  • और रिद्मिस्ट योगेन्द्र सिंह (ढोलक)
    सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दे रहे हैं।

नॉर्वे में भी हुआ था ऐतिहासिक आयोजन
इससे पूर्व 24 दिसंबर 2025 को नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में भी इसी टूर के तहत एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में करीब 500 प्रवासी उत्तराखंडी मौजूद रहे। साथ ही भारतीय दूतावास के अधिकारी भी कार्यक्रम में शामिल हुए थे। ओस्लो में हुए आयोजन को भी दर्शकों से जबरदस्त सराहना मिली।

यूरोप में आयोजित ये कार्यक्रम न केवल उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और जागर परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंच दे रहे हैं, बल्कि प्रवासी उत्तराखंडियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का भी कार्य कर रहे हैं।

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