
देश के हिमालयी राज्यों में हर वर्ष हिमस्खलन (एवलांच) की घटनाएँ गंभीर चुनौती बनी हुई हैं। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत के हिमालयी क्षेत्र में हर साल औसतन 132 हिमस्खलन की घटनाएँ दर्ज की जा रही हैं। इनमें जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड सबसे अधिक प्रभावित राज्य हैं, जहाँ हिमस्खलन की घटनाओं की संख्या और संभावित जोखिम दोनों ही ज्यादा हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में न केवल हिमस्खलन की घटनाएँ सबसे अधिक दर्ज होती हैं, बल्कि यहां हिमस्खलन संभावित क्षेत्रों (Avalanche Sites) की संख्या भी सबसे ज्यादा है। इसके बाद उत्तराखंड का स्थान आता है, जहाँ ऊँचाई वाले इलाकों में सर्दियों और शुरुआती वसंत के दौरान हिमस्खलन का खतरा बना रहता है।
वहीं, सिक्किम में हिमस्खलन की घटनाएँ सबसे कम पाई गई हैं। आंकड़ों के अनुसार, सिक्किम में औसतन सिर्फ एक हिमस्खलन की घटनारिपोर्ट हुई है, जो अन्य हिमालयी राज्यों की तुलना में काफी कम है।
डीजीआरई करता है हिमस्खलन का पूर्वानुमान
हिमस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदा से निपटने और जान-माल की सुरक्षा के लिए रक्षा भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान (Defence Geoinformatics Research Establishment – DGRE) अहम भूमिका निभा रहा है। डीजीआरई नियमित रूप से हिमस्खलन को लेकर पूर्वानुमान और चेतावनी जारी करता है, जिससे सेना, स्थानीय प्रशासन और आम लोगों को समय रहते सतर्क किया जा सके।
70 से अधिक निगरानी केंद्र और स्वचालित मौसम स्टेशन
हिमस्खलन की सटीक निगरानी और पूर्वानुमान के लिए डीजीआरई ने जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और अन्य हिमालयी क्षेत्रों में 70 से अधिक सरफेस ऑब्जर्वेटरी और ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन स्थापित किए हैं। ये स्टेशन बर्फ की मोटाई, तापमान, हवा की गति, वर्षा और अन्य मौसमीय कारकों पर लगातार नजर रखते हैं।
इनसे प्राप्त आंकड़ों के आधार पर हिमस्खलन की संभावना का आकलन किया जाता है और जोखिम वाले इलाकों में समय रहते अलर्ट जारी किए जाते हैं। इससे सीमा क्षेत्रों में तैनात सुरक्षाबलों, पर्वतीय सड़कों पर यात्रा करने वालों और स्थानीय आबादी की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिलती है।
जलवायु परिवर्तन से बढ़ रही चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और मौसम के बदलते पैटर्न के कारण भविष्य में हिमस्खलन की घटनाओं में और वृद्धि हो सकती है। ऐसे में वैज्ञानिक निगरानी, सटीक पूर्वानुमान और जन-जागरूकता को और मजबूत करने की जरूरत है।