
देहरादून | 21 जनवरी 2026: किश्तवाड़ में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान शहीद हुए वीर जवान गजेंद्र सिंह गढ़िया का पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव वीथी-गैनाड़ तक नहीं पहुंच सका। कारण—आजादी के दशकों बाद भी गांव तक सड़क नहीं पहुंच पाई। मजबूरन ग्रामीणों को 15 किलोमीटर पैदल चलकर शहीद के अंतिम दर्शन करने पड़े।
बांज, फल्यांट और चीड़ के घने जंगलों के बीच बसे वीथी-गैनाड़ गांव में शोक और पीड़ा का माहौल है। शहीद का पार्थिव शरीर गांव न पहुंच पाने का दर्द हर ग्रामीण की आंखों में साफ झलक रहा था। यह वह टीस है, जो शायद वर्षों तक गांववासियों को सालती रहेगी।
गमगीन माहौल में ग्रामीण जनप्रतिनिधियों और व्यवस्था से खामोश नाराजगी जताते नजर आए। शोक की घड़ी में कोई खुलकर बोल नहीं पा रहा था, लेकिन हर चेहरा कई सवाल खड़े कर रहा था। 21वीं सदी में, जब देश विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में आज भी गांवों तक सड़क न पहुंच पाना सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
राज्य गठन के 25 वर्ष बीत जाने के बावजूद पहाड़ के लोगों को सड़क, बिजली, पानी, संचार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यही कारण है कि पहाड़ी गांव तेजी से खाली हो रहे हैं और लोग मजबूरी में पलायन कर रहे हैं। सरकार भले ही रिवर्स पलायन के दावे कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि सड़क समय पर गांव तक पहुंच जाती, तो आज शहीद का पार्थिव शरीर पूरे सम्मान के साथ उनके पैतृक गांव में अंतिम यात्रा के लिए पहुंच सकता था। इस घटना ने एक बार फिर पहाड़ की बुनियादी समस्याओं को देश के सामने ला खड़ा किया है।
उधर, क्षेत्रीय विधायक ने गांव तक सड़क निर्माण कार्य शीघ्र शुरू कराने का आश्वासन दिया है। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि ऐसे आश्वासन पहले भी कई बार मिले हैं, लेकिन धरातल पर हालात जस के तस बने हुए हैं।
शहीद गजेंद्र सिंह गढ़िया का बलिदान हमेशा देश के लिए प्रेरणा रहेगा, लेकिन यह सवाल भी छोड़ गया है कि क्या शहीद के गांव तक सड़क पहुंचाने के लिए भी किसी और बलिदान की जरूरत पड़ेगी?