Rudraprayag:’पापा मेरे लिए चॉकलेट लाना’… बेटे की ये आखिरी ख्वाइश रुद्रप्रयाग की बबीता पर टूटा दुखों का पहाड़.
रुद्रप्रयाग: उत्तराखंड के पहाड़ अपनी नैसर्गिक सुंदरता के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं, लेकिन इन पहाड़ों की खामोशी में अक्सर ऐसी चीखें दब जाती हैं जो इंसानियत को झकझोर कर रख देती हैं। रुद्रप्रयाग जिले के सिंद्रवाणी (नगरासू) गांव में मंगलवार की शाम एक ऐसी ही हृदयविदारक घटना घटी, जिसने न केवल एक मां की गोद सूनी कर दी, बल्कि रिश्तों की संवेदनहीनता की एक ऐसी तस्वीर पेश की जिसे सुनकर किसी का भी दिल पसीज जाए। यहाँ 5 साल के मासूम दक्ष को गुलदार (तेंदुए) ने अपना निवाला बना लिया, लेकिन इस मौत से पहले उस मासूम के जो आखिरी शब्द थे, वे ताउम्र उसकी मां बबीता के कानों में गूंजते रहेंगे।

वो मनहूस शाम और आंगन में पसरा सन्नाटा मंगलवार, 3 फरवरी की शाम। पहाड़ों में दिन ढलने को था और सिंद्रवाणी गांव रोज की तरह शांत था। शाम के करीब 5 बजे, 5 वर्षीय दक्ष अपनी मां बबीता के साथ घर के आंगन में खेल रहा था। एक मां के लिए उसका बेटा ही उसकी पूरी दुनिया होता है, खासकर तब जब वह दुनिया की बाकी मुश्किलों से अकेले लड़ रही हो। बबीता और दक्ष को जरा भी भनक नहीं थी कि उनके घर के आंगन के पास उगी झाड़ियों में मौत छिपी बैठी है। इंसान के खून का स्वाद चख चुका एक गुलदार वहां घात लगाए बैठा था।
अचानक, एक झपट्टा और सब कुछ खत्म। गुलदार बिजली की तेजी से आया और मासूम दक्ष को अपने जबड़ों में दबाकर जंगल की ओर भाग निकला। यह सब इतनी जल्दी हुआ कि बबीता को संभलने का मौका भी नहीं मिला। वह चीखी, चिल्लाई, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जिस आंगन में कुछ पल पहले तक दक्ष की किलकारियां गूंज रही थीं, वहां अब एक डरावना सन्नाटा और एक मां की चीत्कार बची थी।
दक्ष की मौत जितनी दर्दनाक है, उसके जीवन की कहानी उतनी ही मार्मिक। बबीता देवी की यह त्रासदी सिर्फ एक जंगली जानवर के हमले तक सीमित नहीं है। इस दुखियारी मां ने पिछले चार साल एक ऐसे अकेलेपन में गुजारे हैं, जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। दक्ष के पिता, हेमंत सिंह, चार साल पहले रोजगार की तलाश में मुंबई गए थे। उम्मीद थी कि वे परिवार का सहारा बनेंगे, लेकिन वहां जाकर वे अपने परिवार—पत्नी, बूढ़े मां-बाप और तीन बच्चों—को पूरी तरह भूल गए।
घटना से कुछ ही समय पहले, बबीता ने अपने पति हेमंत को फोन मिलाया था। शायद मन में यह आस थी कि पति का दिल पसीजेगा। उसने फोन दक्ष को दिया। नन्हे दक्ष ने अपनी तोतली जुबान में पिता से कहा था, “पापा, मेरे लिए चॉकलेट और गाड़ी लाना।”
एक पिता के लिए यह शब्द दुनिया की सबसे बड़ी खुशी हो सकते थे, लेकिन हेमंत का जवाब पत्थर दिल वाला था। उसने कहा, “पैसे नहीं हैं, कहां से लाऊं?” और फोन काट दिया। नियति का खेल देखिए, ये दक्ष के अपने पिता से कहे आखिरी शब्द बन गए। चॉकलेट और खिलौना गाड़ी तो नहीं आई, लेकिन मौत जरूर आ गई। बताया जा रहा है कि जब बबीता ने अपने बेटे की मौत की खबर देने के लिए दोबारा पति को फोन किया, तो उसने फोन उठाया, लेकिन बिना एक शब्द बोले फोन काट दिया।
डीएम के सामने फफक पड़ी बबीता घटना की सूचना मिलते ही प्रशासन हरकत में आया। रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी प्रतीक जैन जब पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे, तो वहां का दृश्य देखकर उनकी भी आंखें नम हो गईं। बबीता, जो अब तक अपने दुखों को सीने में दबाए बैठी थी, डीएम के सामने फफक कर रो पड़ी।
उसने सिसकते हुए एक ऐसा सवाल उठाया जो समाज और कानून दोनों के लिए चिंता का विषय है। बबीता ने कहा, “जब पालने नहीं थे तो बच्चे पैदा क्यों किए? सजा सिर्फ मुझे नहीं, मेरे बच्चों को भी मिल रही है… उस पिता को भी सजा मिलनी चाहिए।” यह सिर्फ एक मां का गुस्सा नहीं था, बल्कि उस महिला की टूटी हुई आत्मा की आवाज थी जिसने गरीबी, अकेलेपन और अब अपने बेटे की मौत का सामना अकेले किया है।
पहाड़ की नारी का संघर्ष और उजड़ता परिवार बबीता की कहानी उत्तराखंड के हजारों परिवारों की कहानी है। पति के जाने के बाद वह घर की रीढ़ बनी हुई थी। घर की हालत ऐसी कि गौशाला की छत तक नहीं है। बबीता सुबह से शाम तक खेती-बाड़ी, जंगल से चारा लाने और पशुओं की देखभाल में लगी रहती थी, ताकि अपने बच्चों—10 साल की कृतिका, 7 साल की काव्या और 5 साल के दक्ष—का पेट पाल सके। खेतों में उगा अनाज और पशुओं का दूध ही उनका सहारा था। नकद पैसे उन्होंने शायद ही कभी देखे हों।
अब दक्ष के जाने के बाद उसकी दोनों बहनें, कृतिका और काव्या, गुमसुम हैं। वे अपनी मां को रोते हुए देख रही हैं, घर में लगी भीड़ को देख रही हैं, लेकिन शायद उन्हें अभी तक यह समझ नहीं आया है कि उनका छोटा भाई अब कभी लौटकर नहीं आएगा।
प्रशासन की मदद, पर सवाल अब भी जिंदा जिलाधिकारी प्रतीक जैन ने पीड़ित परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की है। प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए खनन न्यास से आवास निर्माण के लिए 1.20 लाख रुपये की सहायता राशि देने की घोषणा की है। इसके अलावा, वन विभाग की ओर से 10 लाख रुपये का मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। डीएम ने यह भी आश्वासन दिया है कि बबीता की दोनों बेटियों को 18 वर्ष की आयु तक सरकारी योजनाओं के तहत हर संभव मदद दी जाएगी।
लेकिन यक्ष प्रश्न अब भी वहीं खड़ा है—क्या 10 लाख रुपये का मुआवजा उस मां की सूनी गोद को भर सकता है? क्या कोई सरकारी योजना उस बच्चे की ‘चॉकलेट’ वाली मासूम मांग को पूरा कर सकती है? सिंद्रवाणी की यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष और पलायन का दर्द किस तरह पहाड़ के गांवों को खोखला कर रहा है। आज बबीता के पास न बेटा है, न पति का साथ। बची हैं तो सिर्फ वो यादें और दक्ष के वो आखिरी शब्द, जो ताउम्र उसे और इस निष्ठुर समाज को कचोटते रहेंगे।