
देहरादून (6 फरवरी 2026):
- उत्तराखंड सरकार ने मदरसा शिक्षा प्रणाली में एक ऐतिहासिक बदलाव किया है, जिससे हजारों मुस्लिम छात्र-छात्राओं के भविष्य के दरवाजे खुल गए हैं। प्रदेश में ‘अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ के गठन के बाद अब राज्य के 452 मदरसे शिक्षा की मुख्यधारा से जुड़ेंगे। सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि मदरसों से मिलने वाले शैक्षिक प्रमाण पत्र अब सरकारी नौकरियों के लिए पूरी तरह मान्य होंगे।

43 हजार से ज्यादा छात्रों का भविष्य अधर में था
मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष मुफ्ती शमून कासमी ने बताया कि अब तक मदरसों से मुंशी, मौलवी, आलिम, कामिल और फाजिल की डिग्रियां लेने वाले छात्र सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन नहीं कर पाते थे।
आंकड़े: प्रदेश में अब तक 43,186 से ज्यादा बच्चे विभिन्न वर्षों में ये डिग्रियां हासिल कर चुके हैं।
समस्या: मुंशी, मौलवी और आलिम की डिग्रियां उत्तराखंड बोर्ड की 10वीं और 12वीं के समकक्ष नहीं मानी जाती थीं, जिससे बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा था। अब उत्तराखंड बोर्ड से संबद्धता के बाद यह समस्या खत्म हो जाएगी।
दोपहर तक बोर्ड की पढ़ाई, फिर धार्मिक शिक्षा
विशेष सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते ने नई व्यवस्था की जानकारी देते हुए बताया कि मदरसों का समय अब दो भागों में बंटा होगा:
दोपहर तक: बच्चे उत्तराखंड बोर्ड का पाठ्यक्रम (Syllabus) पढ़ेंगे, ताकि वे आधुनिक शिक्षा और प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार हो सकें।
दोपहर के बाद: बच्चे धार्मिक शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे। धार्मिक शिक्षा का पाठ्यक्रम अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण तय करेगा।
मानकों पर खरा उतरना होगा अनिवार्य
सरकार ने स्पष्ट किया है कि मदरसों को उत्तराखंड बोर्ड से संबद्धता (Affiliation) तभी मिलेगी, जब वे तय मानकों को पूरा करेंगे।
प्राथमिक स्तर के मदरसों को प्राथमिक शिक्षा के मानक और माध्यमिक स्तर के मदरसों को उसके अनुरूप सुविधाएं और शैक्षिक गुणवत्ता सुनिश्चित करनी होगी।