नैनीताल/हल्द्वानी (14 फरवरी 2026): उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हल्द्वानी के बनभूलपुरा में 2018 में हुए एक मानसिक रूप से दिव्यांग युवती के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म मामले में निचली अदालत के फैसले को पलट दिया है. न्यायमूर्ति रवींद्र मैठानी और न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की खंडपीठ ने पुलिस की जांच और फॉरेंसिक सबूतों की सुरक्षा में बरती गई लापरवाही को आधार बनाते हुए दोनों आरोपियों को दुष्कर्म के आरोपों से बरी कर दिया है.

पुलिस की थ्योरी और सबूतों में छेद अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि बरामद किए गए कपड़ों और फॉरेंसिक नमूनों को लैब भेजने तक सुरक्षित रखा गया था. चेन ऑफ कस्टडी पर सवाल: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक बरामदगी की ईमानदारी और सुरक्षा का दस्तावेजी प्रमाण न हो, वैज्ञानिक रिपोर्ट को निर्णायक नहीं माना जा सकता.
डीएनए रिपोर्ट: जांच में पीड़िता के कपड़ों या शरीर से लिए गए नमूनों में आरोपी का डीएनए नहीं मिला, जिसने उसे यौन हमले के कृत्य से बाहर कर दिया. कोर्ट ने कहा कि केवल संदेह या साथ देखे जाने के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.
एक आरोपी को अपहरण में सजा, पर हो चुकी है पूरी अदालत ने दूसरे आरोपी, मूल चंद्र, को सीसीटीवी फुटेज के आधार पर अपहरण (धारा 363) का दोषी माना, जिसमें वह युवती का हाथ पकड़कर ले जाते दिखा था.
कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की मानसिक स्थिति अबोध बालक जैसी थी, इसलिए उसकी सहमति का कोई अर्थ नहीं था.
निचली अदालत ने उसे अपहरण के लिए 4 साल की सजा सुनाई थी. चूंकि वह पहले ही 4 साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है, इसलिए कोर्ट ने उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया (यदि किसी अन्य मामले में वांछित न हो).
पहले आरोपी को मिली पूर्ण रिहाई कोर्ट ने पहले आरोपी की अपील को स्वीकार करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया और तत्काल रिहाई के आदेश दिए.