
दून पुस्तक मेले में सृजन के बाल पर्व फूलदेई पर धाद साहित्य एकांश द्वारा बाल साहित्य पर विमर्श का आयोजन हुआ. धाद साहित्य एकांश द्वारा बाल साहित्य के निमित्त विमर्श पर एक सत्र का आयोजन किया गया। सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ दिनेश चमोला एवं श्री अशोक मिश्र उपस्थित रहे।
उल्लेखनीय है कि धाद सृजन के बाल पर्व फूलदेई में हर वर्ष उत्तराखंड के दस हजार बच्चों के रचनात्मक प्रतिभाग के साथ विद्यालयों में विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों का आयोजन करती है साथ ही साहित्यिक विमर्शों के जरिए बाल साहित्य पर विमर्श का आयोजन भी करते हैं

धाद साहित्य एकांश द्वारा बाल साहित्य के निमित्त विमर्श पर एक सत्र का आयोजन किया गया। सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ दिनेश चमोला एवं श्री अशोक मिश्र उपस्थित रहे।
उल्लेखनीय है कि धाद सृजन के बाल पर्व फूलदेई में हर वर्ष उत्तराखंड के दस हजार बच्चों के रचनात्मक प्रतिभाग के साथ विद्यालयों में विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों का आयोजन करती है साथ ही साहित्यिक विमर्शों के जरिए बाल साहित्य पर विमर्श का आयोजन भी करते हैं
कार्यक्रम के आरंभ में धाद साहित्य एकांश की संयोजक श्रीमती कल्पना बहुगुणा ने सभी आए हुए अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी में साहित्य का लेखन और पठन पाठन का ह्रास हो रहा है, इस चिंता को ध्यान में रखते हुए नयी पीढ़ी में पाठक और लेखक तैयार करने के उद्देश्य को लेकर साहित्य एकांश ने बच्चों के साथ मिलकर कुछ साहित्यिक गतिविधि की योजना पर काम करने का तय किया है। ऐसा बाल साहित्य जो उत्तराखंड के परिवेश को लेकर हो, जो रुचिकर के साथ सरल भाषा में हो, स्थानीयता का समावेश हो, पुस्तक को पढ़कर बच्चा महसूस कर पाए उसकी चेतना जागृत हो और पुस्तकों से प्रेम हो।
इसके पश्चात बाल साहित्यकार श्री अशोक मिश्रा ने कहा कि यदि किसी समाज और देश को अपने उज्जवल भविष्य की तरफ़ कदम बढ़ाना है तो उसे अपने बच्चों के बौद्धिक एवं भावनात्मक विकास पर ज्यादा ध्यान देना होगा और मेरा विश्वास है कि यह काम बाल साहित्य के माध्यम से सरलता से किया जा सकता है।
बाल साहित्य पर अपनी बात रखते हुए मुख्य वक्ता के रूप मे राष्ट्रीय साहित्य अकादमी के बाल साहित्य पुरस्कार विजेता वरिष्ठ प्रोफेसर दिनेश चमोला ‘शैलेश’ ने कहा कि बाल साहित्य किसी भी देश के बालकों के चरित्र-निर्माण की व्यावहारिक प्रयोगशाला है । माता-पिता, गुरु तथा साहित्यकार की भूमिका एक कुम्हार अथवा दक्ष माली की तरह होती है । कोई भी बालक प्रकृति, नियति एवं ईश्वर का दुर्लभ उपहार होता है । उसकी प्रतिभा के विकास तथा उत्प्रेरण में अभूतपूर्व भूमिका इन सबकी होती है। ऐसे में बाल साहित्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है ।
इस अवसर पर धाद साहित्य एकांश की मुख्य संयोजक एवं दस कथाकार दस कहानियां, की संपादक डॉ. विद्या सिंह ने शामिल कहानियों के चयन एवं विद्यार्थियों हेतु उनकी उपयोगिता आदि पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि टीवी इंटरनेट,ए आई युग के बच्चों में पुस्तकें पढ़ने की आदत विकसित करना एक चुनौती पूर्ण कार्य है। इस दिशा में कहानी उपयोगी साबित हो सकती है। इन कहानियों से बच्चे अपनी क्षेत्रीय तथा वैश्विक स्थितियों से परिचित हो सकेंगे और अपनी सकारात्मक भूमिका द्वारा समाज को रचनात्मक सहयोग देंगे।
कार्यक्रम के अंत में धाद द्वारा संचालित कोना कक्षा का के मुख्य संयोजक श्री गणेश उनियाल ने सभी अतिथियों का धन्यवाद करते हुए कहा कि एक कोना कक्षा का सरल शब्दों में यह शिक्षा के पक्ष में शासन के साथ आम समाज की भूमिका की पैरवी करता है। समाज के अंतिम आदमी का प्रतिनिधित्व कर रहे इन विद्यालयों के पक्ष में आम समाज और धाद के सामंजस्य से एक ऐसा अभियान जो इन विद्यालयों में आने वाले छात्रों को एक बेहतर विवेकशील नागरिक बनाने में अपनी भूमिका निभाता है।

हम हर वर्ष उत्तराखंड के बाल पर्व फूलदेई को 14 मार्च से 14 अप्रैल तक कोना कक्षा के वार्षिक आयोजन के रूप में मनाते हैं। जिसमें बच्चों के लिए अलग अलग रचनात्मक प्रतिभाग आयोजित किये जाते हैं। उन्होंने आज के वक्ताओं का सारगर्भित वक्तव्य के लिए आभार व्यक्त किया साथ ही उपस्थित जन समूह एवं बच्चों का भी कार्यक्रम में उपस्थिति के लिए आभार जताया।