उत्तराखंडचमोली

भराड़ीसैंण विधानसभा: 12 वर्षों में मात्र 35 दिन की कार्यवाही

  1. गैरसैंण (चमोली) | उत्तराखंड की जनभावनाओं का प्रतीक रहे गैरसैंण के भराड़ीसैंण विधानसभा भवन की उपयोगिता पर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। पिछले 12 सालों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि करोड़ों की लागत से बने इस भव्य भवन में अब तक केवल 10 सत्र आयोजित किए गए हैं, जिनकी कुल अवधि मात्र 35 दिन रही है।
भराड़ीसैंण विधानसभा: 12 वर्षों में मात्र 35 दिन की कार्यवाही

सत्रों का कालक्रम: टेंट से स्थायी भवन तक का सफर

​गैरसैंण में सदन की शुरुआत साल 2014 में हुई थी। शुरुआती दो सत्र टेंट में आयोजित किए गए थे, जिसके बाद स्थायी भवन में कार्यवाही शुरू हुई।

​2014: पहला सत्र टेंट में (9-11 जून), अवधि: 3 दिन।

​2015: दूसरा सत्र भी टेंट में (2-3 नवंबर), अवधि: 2 दिन।

​2016: स्थायी भवन (भराड़ीसैंण) में पहला सत्र (17-18 नवंबर), अवधि: 2 दिन।

​2017: स्थायी भवन में सत्र (7-8 दिसंबर), अवधि: 2 दिन।

​2018: पहला बड़ा बजट सत्र (20-26 मार्च), अवधि: 7 दिन।

​2019 और 2022: इन दो वर्षों में एक भी दिन सदन की कार्यवाही गैरसैंण में नहीं हुई।

​2020: बजट सत्र (3-7 मार्च), अवधि: 5 दिन।

​2021: बजट सत्र (1-6 मार्च), अवधि: 6 दिन।

​2023: बजट सत्र (13-16 मार्च), अवधि: 4 दिन।

​2024: मानसून सत्र (21-23 अगस्त), अवधि: 3 दिन।

​2025: मानसून सत्र (19-20 अगस्त), अवधि: 2 दिन।

​महत्वपूर्ण सांख्यिकी (2014-2025)

​नीचे दी गई तालिका से स्पष्ट है कि अधिकांश सत्र संक्षिप्त रहे हैं और मुख्य रूप से बजट पारित करने तक सीमित रहे:

वर्ष सत्र का प्रकार कुल दिन स्थान

2014 विशेष सत्र 03 टेंट

2015 विधानसभा सत्र 02 टेंट

2016 विधानसभा सत्र 02 भराड़ीसैंण भवन

2017 विधानसभा सत्र 02 भराड़ीसैंण भवन

2018 बजट सत्र 07 भराड़ीसैंण भवन

2020 बजट सत्र 05 भराड़ीसैंण भवन

2021 बजट सत्र 06 भराड़ीसैंण भवन

2023 बजट सत्र 04 भराड़ीसैंण भवन

2024 विधानसभा सत्र 03 भराड़ीसैंण भवन

2025 विधानसभा सत्र 02 भराड़ीसैंण भवन

योग 10 सत्र 35 दिन

आंकड़ों से स्पष्ट है कि 12 वर्षों के अंतराल में सदन की औसत कार्यवाही प्रति वर्ष 3 दिन से भी कम रही है। साल 2018 में सबसे लंबी कार्यवाही (7 दिन) चली थी, जबकि 2019 और 2022 पूरी तरह शून्य रहे। राज्य आंदोलनकारियों और स्थानीय निवासियों का मानना है कि केवल औपचारिक सत्रों के बजाय, यहां नियमित रूप से कामकाज होना चाहिए ताकि पहाड़ की समस्याओं का समाधान पहाड़ से ही निकल सके।

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