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​चमोली की नई पहल: ग्रीन टी और मसाला टी के बाद अब बाजार में आई ‘कंडाली टी’; खून की कमी और जोड़ों के दर्द में है रामबाण

कर्णप्रयाग/चमोली (6 फरवरी 2026):

उत्तराखंड के पहाड़ों में जिस ‘कंडाली’ (बिच्छू घास) को अब तक केवल एक जंगली खरपतवार समझा जाता था, अब वही कंडाली पहाड़ की महिलाओं के लिए स्वरोजगार का बड़ा जरिया बन गई है। चमोली जिले में ग्रीन टी और मसाला टी के बाद अब ‘कंडाली टी’ (Nettle Tea) बाजार में उतार दी गई है। हार्क (HARK) संस्था और स्थानीय महिला समूहों की इस पहल ने पहाड़ की बेकार समझी जाने वाली घास को ‘इम्यूनिटी बूस्टर’ ड्रिंक में बदल दिया है।

महिलाओं के हाथों में कमान, ग्रामीणों की बढ़ी आय

कालेश्वर में संचालित ‘हार्क अलकनंदा कृषि व्यवसाय स्वायत्त सहकारिता महिला समूह’ ने कंडाली की चाय बनाने का काम शुरू किया है।

​ ग्रामीणों से 100 से 150 रुपये प्रति किलो के हिसाब से कंडाली की सूखी पत्तियां खरीद रही है। इससे गांव वालों को घर बैठे रोजगार मिल रहा है। एक किलो पत्तियों से 40 ग्राम के 25 से अधिक पैकेट तैयार किए जा रहे हैं। प्रबंधक गणेश उनियाल ने बताया कि एक साल में संस्था ग्रामीणों को पत्तियों के बदले करीब डेढ़ लाख रुपये का भुगतान कर चुकी है।

​औषधीय गुणों का खजाना है कंडाली (Nettle)

वैज्ञानिक रूप से अर्टिका डायोइका (Urtica dioica) के नाम से जानी जाने वाली कंडाली स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी मानी जाती है।

​खून की कमी: इसके सेवन से एनीमिया (खून की कमी) दूर होती है।

​जोड़ों का दर्द: यह हड्डियों को मजबूत बनाने और जोड़ों के दर्द (Arthritis) में राहत देती है।

​पेट के रोग: कंडाली की चाय पेट की समस्याओं को दूर करने में भी सहायक है।

​देहरादून से दिल्ली तक मांग

पहाड़ में रोजगार का साधन बन रही कंडाली टी को बाजार में जबरदस्त रिस्पॉन्स मिल रहा है। इसकी बिक्री ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के साथ-साथ देहरादून और दिल्ली के बाजारों में भी हो रही है। जो कंडाली कल तक बंजर खेतों में उगती थी, आज वह कप में सेहत बनकर पहुंच रही है।

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