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नंदा देवी नेशनल पार्क में भीषण वनाग्नि: 5 दिन से धधक रही विश्व धरोहर, जिलाधिकारी ने वायु सेना से मांगी मदद

विश्व धरोहर फूलों की घाटी और पवित्र तीर्थ हेमकुंड साहिब के वन क्षेत्रों में चार दिन से धधक रहे जंगल, सेना से मांगी मदद.

उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में इस वर्ष पर्यावरण का संतुलन बिगड़ने से शीतकाल में वनाग्नि की भयावह स्थिति उत्पन्न हो गई है। विश्व धरोहर नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के अंतर्गत आने वाली भ्यूंडार घाटी के जंगलों में पिछले पांच दिनों से भीषण आग धधक रही है। आग की विकरालता और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए चमोली के जिलाधिकारी ने अब सेना से हवाई मदद की गुहार लगाई है।

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जोशीमठ विकासखंड के गोविंदघाट के समीप स्थित पहाड़ियों में लगी इस आग ने फूलों की घाटी और पवित्र तीर्थ हेमकुंड साहिब के निकटवर्ती वन क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले लिया है। इस आग से न केवल करोड़ों रुपये की बहुमूल्य वन संपदा नष्ट हो रही है, बल्कि क्षेत्र में पाए जाने वाले दुर्लभ वन्य जीवों और औषधीय पौधों के अस्तित्व पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है। समूचे क्षेत्र में धुएं का घना गुबार फैलने से पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है।

नंदा देवी नेशनल पार्क की रेंजर चेतना कांडपाल ने बताया कि आग लक्ष्मण गंगा और अलकनंदा नदियों के मध्य स्थित खड़ी पहाड़ियों पर लगी है। अत्यंत तीव्र ढलान और चट्टानी रास्ता होने के कारण वन कर्मियों का वहां तक पहुंचना जीवन के लिए जोखिम भरा साबित हो रहा है।

  • वन विभाग ने नदी पर एक वैकल्पिक अस्थायी पुल का निर्माण कर आग प्रभावित क्षेत्र तक पहुंचने का प्रयास किया है।

  • सूखी घास और भारी पाला जमा होने के कारण सतह अत्यधिक फिसलन भरी हो गई है, जिससे कर्मचारी पैदल घटनास्थल तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।

  • तेज हवाओं के कारण आग पर काबू पाना और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है।

  • चमोली के जिलाधिकारी गौरव कुमार ने आपदा प्रबंधन सचिव को पत्र लिखकर स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया है। जिलाधिकारी ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि:

    • प्रभावित क्षेत्र की विषम परिस्थितियों के कारण मानवीय प्रयासों से आग बुझाना वर्तमान में असंभव है।

    • 10 और 11 जनवरी को आग बुझाने के जमीनी प्रयास पूरी तरह विफल रहे हैं।

    • उन्होंने वायु सेना या आपदा प्रबंधन के हेलीकॉप्टर से निगरानी करने और आवश्यकता पड़ने पर ‘बाम्बी बकेट’ के माध्यम से पानी के छिड़काव की व्यवस्था करने का आग्रह किया है।

    पर्यावरणविदों ने चिंता व्यक्त की है कि जनवरी माह में, जब इन पहाड़ियों को बर्फ से ढका होना चाहिए था, वहां वनाग्नि की घटनाएं भविष्य के लिए एक खतरे का संकेत हैं। फिलहाल प्रशासन और वन विभाग की टीमें युद्ध स्तर पर आग को फैलने से रोकने की कोशिशों में जुटी हैं, लेकिन अब सारा दारोमदार हवाई सहायता पर टिका है।

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