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नक्सल प्रभावित क्षेत्र से वैश्विक ब्रांड तक: अराकू घाटी की कॉफी ने बदली आदिवासी किसानों की तकदीर

विशाखापत्तनम/अराकू घाटी: आंध्र प्रदेश की अराकू घाटी, जो कभी नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में जानी जाती थी, आज आदिवासी किसानों की मेहनत और जैविक खेती के दम पर अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुकी है। यहां उत्पादित जैविक अरेबिका कॉफी और काली मिर्च ने न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी है, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका को भी सशक्त बनाया है।

अराकू की ऑर्गेनिक कॉफी की मांग लंदन, फ्रांस सहित यूरोप के कई देशों में तेजी से बढ़ी है। बेहतर गुणवत्ता और प्राकृतिक उत्पादन पद्धति के कारण यह कॉफी वैश्विक बाजार में अपनी अलग पहचान बना रही है। इससे क्षेत्र में कृषि आधारित रोजगार और निर्यात गतिविधियों को बढ़ावा मिला है।

केंद्र और राज्य सरकार की सब्सिडी तथा योजनाओं के सहयोग से यहां खेती का आधुनिकीकरण संभव हुआ है। आधुनिक पल्पिंग यूनिट, क्योरिंग सेंटर और नर्सरी जैसी सुविधाओं ने उत्पादन और प्रसंस्करण की गुणवत्ता में सुधार किया है।

प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) द्वारा आयोजित भ्रमण-सह-अध्ययन कार्यक्रम के तहत विशाखापत्तनम पहुंचे उत्तराखंड के पत्रकारों के प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार को अराकू घाटी का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने कॉफी बोर्ड के कार्यालय, नर्सरी, क्योरिंग सेंटर, पल्पिंग यूनिट और किसानों के खेतों का निरीक्षण किया तथा स्थानीय किसानों से बातचीत कर इस परिवर्तन की कहानी को करीब से जाना।

अराकू घाटी आज इस बात का उदाहरण बन चुकी है कि संगठित प्रयास, सरकारी सहयोग और स्थानीय समुदाय की भागीदारी से पर्वतीय क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है।

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