
सीमांत जनपद उत्तरकाशी के ऐतिहासिक एवं पौराणिक काशी विश्वनाथ मंदिर में सोमवार को आस्था का एक अनूठा रंग देखने को मिला। रंगभरी एकादशी के उपलक्ष्य में यहाँ सैकड़ों श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे पर भस्म लगाकर ‘भस्म की होली’ खेली। जयकारों और ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच पूरा मंदिर परिसर शिवमय हो गया।
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काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत अजय पुरी ने बताया कि यहाँ भस्म होली का आयोजन पिछले 10 वर्षों से निरंतर किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य पौराणिक परंपराओं का संरक्षण और संवर्धन करना है। मंदिर में वर्ष भर होने वाले अनुष्ठानों, यज्ञों और धूनी की पवित्र भस्म को इस दिन प्रसाद के रूप में उड़ाया जाता है। श्रद्धालु न केवल इसे एक-दूसरे को लगाते हैं, बल्कि आशीर्वाद के रूप में अपने घर भी ले जाते हैं।
उज्जैन की तर्ज पर आयोजन
सोमवार सुबह की मंगल आरती के पश्चात सबसे पहले स्वयंभू शिवलिंग का पूजन किया गया। इसके बाद हवन कुंड की भस्म से बाबा का श्रृंगार हुआ। स्वाति वाचन और मंत्रोच्चार के बीच महंत ने हवा में भस्म उड़ाकर होली की औपचारिक शुरुआत की। इसके बाद देखते ही देखते पूरा परिसर श्वेत रंग में रंग गया। श्रद्धालुओं ने उज्जैन के महाकाल मंदिर की तर्ज पर इस उत्सव का आनंद लिया।
सांस्कृतिक नृत्यों की रही धूम
भस्म की होली के दौरान स्थानीय संस्कृति की झलक भी साफ दिखाई दी। युवा और बुजुर्ग सभी पारंपरिक रासो और तांदी नृत्य पर जमकर थिरके। ढोल-दमाऊ की थाप और बाबा के भजनों ने वातावरण को और भी भक्तिमय बना दिया।
प्राकृतिक होली को बढ़ावा
महंत अजय पुरी ने इस आयोजन के वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा:
”आजकल होली के रंगों में रसायनों (केमिकल्स) का अत्यधिक प्रयोग होता है, जो त्वचा और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। यज्ञ की भस्म पूर्णतः प्राकृतिक और पवित्र होती है। यह आयोजन लोगों को प्रकृति से जुड़ने और सुरक्षित होली खेलने का संदेश देता है।”
इस भव्य आयोजन में उत्तरकाशी शहर सहित आसपास के गांवों से आए सैकड़ों श्रद्धालुओं ने शिरकत की और बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद प्राप्त किया।