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भारत ने 26 राफेल मरीन जेट्स के लिए फ्रांस से 63 हजार करोड़ की डील की, INS विक्रांत पर होगी तैनाती

भारत और फ्रांस ने सोमवार को एक बड़े रक्षा सौदे पर हस्ताक्षर किए हैं। इस करार के तहत भारत को 26 अत्याधुनिक राफेल मरीन लड़ाकू विमान मिलेंगे। 63,000 करोड़ रुपये की इस डील के तहत ये विमान भारतीय नौसेना के विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत पर तैनात किए जाएंगे।

डील पर हस्ताक्षर रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने किए, जिसमें नौसेना के उप प्रमुख वाइस एडमिरल के. स्वामीनाथन भी मौजूद रहे। समारोह में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी भाग लिया। हालांकि, फ्रांस के रक्षा मंत्री निजी कारणों से इसमें शामिल नहीं हो सके।

इस मेगा डील को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (CCS) ने तीन सप्ताह पहले मंजूरी दी थी। जुलाई 2023 में रक्षा मंत्रालय ने इस अधिग्रहण को सैद्धांतिक मंजूरी दी थी।

पुराने मिग-29के की जगह लेंगे नए राफेल मरीन

भारतीय नौसेना मौजूदा मिग-29के बेड़े के स्थान पर राफेल मरीन जेट्स को शामिल करेगी। खराब प्रदर्शन और रखरखाव की समस्याओं के कारण मिग-29के विमानों को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाएगा।

26 राफेल मरीन विमानों में से 22 सिंगल-सीटर और 4 ट्विन-सीटर जेट्स होंगे। इस सौदे में विमानों के साथ हथियार प्रणालियां, लॉजिस्टिक सपोर्ट, प्रशिक्षण पैकेज और स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देने के प्रावधान भी शामिल हैं।

राफेल मरीन: समुद्री मिशनों के लिए खास

राफेल मरीन को विशेष रूप से विमानवाहक पोतों से संचालन के लिए डिजाइन किया गया है। यह एक मिनट में 18,000 मीटर तक ऊंचाई हासिल कर सकता है और दुश्मन के रडार को चकमा देने में माहिर है।
3700 किलोमीटर दूर तक हमला करने की क्षमता रखने वाला यह फाइटर जेट चीन के जे-20 और पाकिस्तान के एफ-16 विमानों से कहीं अधिक उन्नत माना जा रहा है।

राफेल मरीन के विंग्स मोड़े जा सकते हैं, जिससे यह सीमित स्थान पर भी आसानी से तैनात हो सकता है। इसका वजन लगभग 10,300 किलोग्राम है, जो पारंपरिक राफेल विमान से थोड़ा अधिक है।

राफेल जेट्स की बढ़ती ताकत

भारतीय वायुसेना पहले ही 36 राफेल विमानों का बेड़ा संचालित कर रही है। अब इस डील के बाद देश के पास कुल 62 राफेल जेट होंगे, जिससे भारत के 4.5 पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की ताकत और बढ़ेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन नए विमानों के शामिल होने से भारत की समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक बढ़त दोनों में उल्लेखनीय इजाफा होगा, खासकर मौजूदा क्षेत्रीय तनाव को देखते हुए।

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