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चंपावत की पहचान बनी काली कुमाऊं की खड़ी होली: 15वीं शताब्दी से सजीव स्वर्णिम लोक परंपरा

चंपावत/लोहाघाट: रंगों के पर्व होली की बात आते ही जहां देशभर में अबीर-गुलाल और उमंग का दृश्य उभरता है, वहीं चंपावत जनपद के लोहाघाट क्षेत्र में मनाई जाने वाली काली कुमाऊं की खड़ी होली अपनी विशिष्ट सांगीतिक परंपरा के कारण अलग पहचान रखती है। यह केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सुर, ताल और लोकसंस्कृति का जीवंत उत्सव है, जिसकी जड़ें 15वीं शताब्दी तक पहुंचती हैं।

चंद राजाओं के काल में हुआ विकास

इतिहासकारों के अनुसार 15वीं शताब्दी में चंद राजवंश के शासनकाल में चंपावत सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। इसी कालखंड में खड़ी होली की परंपरा विकसित हुई। कुमाऊंनी लोकधुनों और ब्रज क्षेत्र की भक्ति परंपराओं के संगम से यह शैली आकार लेती गई। समय के साथ यह काली कुमाऊं अंचल की सांस्कृतिक पहचान बन गई।

बैठकी और खड़ी होली का अनूठा संगम

काली कुमाऊं की होली में दो प्रमुख स्वरूप देखने को मिलते हैं—बैठकी होली और खड़ी होली।

  • बैठकी होली में शास्त्रीय संगीत के रागों पर आधारित भक्ति, श्रृंगार, संयोग और वियोग के गीत गाए जाते हैं।
  • खड़ी होली में समूहबद्ध होकर पारंपरिक वेशभूषा में लोकधुनों पर गान और नृत्य किया जाता है।

खड़ी होली की विशेषता यह है कि गायक गोल घेरा बनाकर खड़े होते हैं और ढोल-दमाऊं की थाप पर सामूहिक गायन करते हैं। गीतों में जहां एक ओर राधा-कृष्ण की लीलाओं का वर्णन होता है, वहीं सामाजिक सरोकारों और लोकजीवन की झलक भी मिलती है।

गांव-गांव तक जीवंत परंपरा

काली कुमाऊं क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में आज भी होली का आगाज बसंत पंचमी से हो जाता है। इसके बाद फाल्गुन मास भर गांवों में होली गायन की महफिलें सजती हैं। बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक, सभी पीढ़ियां इस परंपरा को आगे बढ़ाने में भागीदारी निभाती हैं।

स्थानीय लोगों का मानना है कि खड़ी होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। बदलते समय के बावजूद यह परंपरा आज भी पूरी गरिमा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है।

सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की जरूरत

लोकसंस्कृति के जानकारों का कहना है कि काली कुमाऊं की खड़ी होली को व्यापक स्तर पर पहचान दिलाने और नई पीढ़ी को इससे जोड़ने की आवश्यकता है। यदि इसे संगठित रूप से प्रोत्साहन मिले तो यह परंपरा न केवल उत्तराखंड, बल्कि देश-विदेश में भी अपनी अलग पहचान स्थापित कर सकती है।

काली कुमाऊं की खड़ी होली आज भी अपने स्वर्णिम इतिहास, मधुर सुरों और सामूहिक उत्साह के साथ चंपावत की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है।

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