केरल: चुनावी ड्यूटी और काम के दबाव ने ली शिक्षक की जान! नदी में कूदकर दी जान, परिजनों ने प्रशासन को घेरा
कासरगोड (केरल)। केरल के कासरगोड जिले में एक सरकारी स्कूल के शिक्षक द्वारा नदी में कूदकर आत्महत्या करने का हृदयविदारक मामला सामने आया है। मृतक शिक्षक, जो बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) के रूप में भी कार्यरत थे, के परिजनों ने मौत के लिए चुनावी कार्य के अत्यधिक दबाव और मानसिक तनाव को जिम्मेदार ठहराया है।

मोगराल पुल से लगाई छलांग
मृतक की पहचान सवाद के रूप में हुई है, जो मोगराल पुथुर के निवासी थे और चेरकला सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल में तैनात थे। चश्मदीदों के अनुसार, सवाद ने अपनी बाइक मोगराल पुल पर खड़ी की और अचानक नदी में छलांग लगा दी। स्थानीय लोगों की मदद से उन्हें तुरंत पानी से बाहर निकालकर कासरगोड जनरल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों के तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
सुसाइड नोट और आधिकारिक बयान
पुलिस को मौके से एक पत्र मिला है, जिसमें सवाद ने इस आत्मघाती कदम के पीछे व्यक्तिगत कारणों का उल्लेख किया है। रिटर्निंग ऑफिसर बीनू जोसेफ ने स्पष्ट किया कि पत्र में आधिकारिक तौर पर काम के तनाव का कोई सीधा जिक्र नहीं है। हालांकि, जिला कलेक्टर ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच के आदेश दिए हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या शिक्षक पर कोई पेशेवर दबाव था।
परिजनों का गंभीर आरोप: “यह संस्थागत विफलता है”
सवाद के परिवार ने आधिकारिक पक्ष को पूरी तरह खारिज कर दिया है। परिजनों का आरोप है कि:
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शिक्षक पर स्कूल में पढ़ाने के साथ-साथ BLO की अतिरिक्त जिम्मेदारियों का भारी बोझ था।
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चुनाव आयोग की सख्त डेडलाइन और मतदाता सूची के कार्यों ने उन पर गहरा मनोवैज्ञानिक दबाव डाला।
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परिवार ने इसे महज आत्महत्या न मानकर ‘संस्थागत विफलता’ करार दिया है और उच्चाधिकारियों द्वारा डाले गए दबाव की जांच की मांग की है।
अस्पताल में प्रदर्शन और मुआवजे की मांग
घटना के बाद तनाव उस समय बढ़ गया जब परिजनों और स्थानीय लोगों ने अस्पताल से शव लेने से इनकार कर दिया। उनकी मांग थी कि जिला कलेक्टर स्वयं आकर उनसे बात करें और पीड़ित परिवार के लिए उचित सरकारी मुआवजे की घोषणा की जाए। स्थानीय पुलिस ने फिलहाल ‘अप्राकृतिक मौत’ का मामला दर्ज किया है और शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया है।
शिक्षकों पर बढ़ते बोझ पर छिड़ी बहस
सवाद की मौत ने केरल में सरकारी शिक्षकों पर पड़ने वाले काम के बोझ को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। शिक्षक संघों का कहना है कि शिक्षकों को नियमित अध्यापन के साथ-साथ मतदाता सूची पुनरीक्षण जैसे जटिल प्रशासनिक कार्यों में झोंक दिया जाता है, जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। इस घटना के बाद से शिक्षकों पर प्रशासनिक बोझ कम करने के लिए सरकारी हस्तक्षेप की मांग तेज हो गई है।