राज्यसभा चुनाव: भाजपा का बड़ा दांव, नितिन नबीन बिहार से भरेंगे हुंकार.

भारतीय जनता पार्टी ने आगामी राज्यसभा चुनावों के लिए अपनी बहुप्रतीक्षित 9 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है। इस सूची में सबसे चौंकाने वाला और महत्वपूर्ण नाम पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का है। भाजपा ने उन्हें बिहार से चुनावी मैदान में उतारने का फैसला किया है, जो राज्य की सियासत में एक नई हलचल पैदा कर रहा है।
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रणनीति के केंद्र में बिहार और अध्यक्ष
चुनाव आयोग ने 16 मार्च को 10 राज्यों की 37 सीटों पर चुनाव के लिए अधिसूचना जारी की है। भाजपा की इस पहली सूची से साफ है कि वह उच्च सदन (राज्यसभा) में अपने नेतृत्व को और अधिक मुखर बनाना चाहती है।
नितिन नबीन को बिहार से भेजने के पीछे मुख्य कारण:
संसदीय सक्रियता: राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते नबीन का संसद में होना जरूरी है ताकि वे राष्ट्रीय नीतियों और संसदीय बहसों में सीधे तौर पर पार्टी का पक्ष रख सकें।
बिहार का समीकरण: बिहार में आरजेडी के प्रेम चंद गुप्ता की सीट खाली हो रही है। विधानसभा में एनडीए के संख्या बल को देखते हुए भाजपा के लिए यह सीट जीतना बेहद आसान नजर आ रहा है।
उम्मीदवारों की पूरी सूची: एक नजर में
भाजपा ने उन राज्यों पर ध्यान केंद्रित किया है जहाँ वे या तो सत्ता में हैं या उनका गठबंधन मजबूत है।
उम्मीदवार राज्य
नितिन नबीन बिहार
शिवेश कुमार बिहार
तेराश गोवाल्ला असम
जोगेन मोहन असम
लक्ष्मी वर्मा छत्तीसगढ़
संजय भाटिया हरियाणा
मनमोहन सामल ओडिशा
सुजीत कुमार ओडिशा
राहुल सिन्हा पश्चिम बंगाल
इस चयन के पीछे का ‘मास्टर प्लान’
पार्टी सूत्रों और राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस सूची में केवल नाम नहीं, बल्कि एक गहरा सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन छिपा है:
क्षेत्रीय पैठ: ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से उम्मीदवारों को उतारकर भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि वह विपक्षी गढ़ों में अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देगी।
अनुभव और युवा जोश: हरियाणा से संजय भाटिया जैसे अनुभवी चेहरे और छत्तीसगढ़ से लक्ष्मी वर्मा के जरिए पार्टी ने अनुभव और महिला प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता दी है।
संगठनात्मक मजबूती: असम और छत्तीसगढ़ में स्थानीय चेहरों को मौका देकर कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने की कोशिश की गई है।
क्या कहते हैं पार्टी के दिग्गज?
पार्टी के एक राष्ट्रीय प्रवक्ता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह निर्णय केवल चुनाव जीतने के लिए नहीं, बल्कि संगठनात्मक दूरदर्शिता का परिणाम है। उनके अनुसार, “पार्टी अध्यक्ष का संसद का सदस्य होना संसदीय प्रणाली में उनकी भागीदारी को अनिवार्य बनाता है। यह फैसला आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों की तैयारी का एक ठोस संकेत है।”