
देहरादून: उत्तराखंड की शांत वादियों में इस समय राजनीतिक तूफान की आहट सुनाई दे रही है। भारतीय जनता पार्टी, जो अपनी अनुशासित कार्यशैली के लिए जानी जाती है, इस समय एक बड़े ‘अंदरूनी विद्रोह’ का सामना कर रही है। बदरी-केदार मंदिर समिति (BKTC) के पूर्व अध्यक्ष और फायरब्रांड नेता अजेंद्र अजय ने अपनी ही सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाकर सियासी गलियारों में खलबली मचा दी है।
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पीएम मोदी के बयान का हवाला और संन्यास की चेतावनी
अजेंद्र अजय की नाराजगी ने तब गंभीर रूप ले लिया जब उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी व्यथा साझा की। उन्होंने सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस मशहूर कथन को कोट किया, जिसमें कहा गया था कि “21वीं सदी का तीसरा दशक उत्तराखंड का दशक होगा।” अजय का तर्क है कि यदि यह दशक वास्तव में उत्तराखंड का है, तो शासन और व्यवस्थाओं में वह गंभीरता और सुचिता दिखनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि हालात नहीं सुधरे, तो वे राजनीति से संन्यास ले लेंगे। उनके इस बयान को भाजपा के भीतर कार्यकर्ताओं की दबी हुई नाराजगी का चेहरा माना जा रहा है।
प्रदेश अध्यक्ष की ‘नसीहत’ भी रही बेअसर
मामले को तूल पकड़ता देख भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने मोर्चा संभाला और नेताओं को सार्वजनिक बयानबाजी से बचने की सख्त हिदायत दी। उन्होंने दो-टूक कहा कि असंतोष का मंच सोशल मीडिया नहीं, बल्कि संगठन की बैठकें होनी चाहिए।
बगावत की आग: हैरानी की बात यह है कि अध्यक्ष की नसीहत के बाद भी अजेंद्र अजय के तेवर ठंडे नहीं पड़े। उन्होंने पलटवार करते हुए सोशल मीडिया पर अपनी बात फिर दोहराई, जिससे संकेत मिल रहे हैं कि पार्टी के भीतर का असंतोष काफी गहरा है।
कांग्रेस की एंट्री: ‘ये तो बस शुरुआत है’
भाजपा के इस घरेलू विवाद में अब मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने भी छलांग लगा दी है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने इसे भाजपा के पतन की शुरुआत बताया है।
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गोदियाल का तंज: “अजेंद्र अजय अकेले नहीं हैं, यह भाजपा के हजारों उपेक्षित कार्यकर्ताओं की आवाज है। भाजपा में अब विचारधारा की जगह केवल सत्ता की राजनीति बची है।”
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पुरानी टीस: राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अरविंद पांडे, बिशन सिंह चुफाल और त्रिवेंद्र सिंह रावत जैसे दिग्गजों के समय-समय पर आए बयान भी इसी असंतोष की कड़ियाँ हैं।
क्या पार्टी लेगी कोई बड़ा एक्शन?
सूत्रों की मानें तो हाईकमान इस पूरे प्रकरण पर पैनी नजर बनाए हुए है। एक तरफ जहां पार्टी आगामी चुनावी रणनीतियों में जुटी है, वहीं इस तरह की ‘अंदरूनी जंग’ उसकी छवि को नुकसान पहुंचा सकती है। चर्चा है कि अनुशासन बनाए रखने के लिए पार्टी जल्द ही कुछ कठोर कदम उठा सकती है।
विवाद का केंद्र | अजेंद्र अजय की सरकार के खिलाफ नाराजगी। | | धमकी | राजनीति से संन्यास लेने का विचार। | | कारण | व्यवस्थाओं में कमी और पीएम मोदी के विजन की अनदेखी का आरोप। | | विपक्ष का स्टैंड | कांग्रेस इसे ‘सत्ता की राजनीति’ का परिणाम बता रही है। |
आगे क्या? अब देखना यह होगा कि क्या महेंद्र भट्ट और मुख्यमंत्री धामी इस ‘डैमेज’ को कंट्रोल कर पाते हैं, या अजेंद्र अजय का यह विद्रोह भाजपा के लिए कोई बड़ी चुनौती बनेगा।