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स्टोन क्रशरों का जुर्माना माफी मामला: हाईकोर्ट ने मांगे दस्तावेज, दो हफ्ते का समय.

नैनीताल उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नैनीताल जिले में स्टोन क्रशरों के करोड़ों रुपये के जुर्माने को माफ किए जाने के मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा है। अदालत ने निर्देश दिए हैं कि याचिकाकर्ता दो सप्ताह के भीतर अतिरिक्त शपथपत्र के माध्यम से उपलब्ध सभी साक्ष्य कोर्ट में पेश करें।

स्टोन क्रशरों का जुर्माना माफी मामला: हाईकोर्ट ने मांगे दस्तावेज, दो हफ्ते का समय

खंडपीठ ने मांगी विस्तृत जानकारी

मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में हुई। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता अपने दावों के समर्थन में उपलब्ध दस्तावेजों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें, ताकि मामले की निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित हो सके।

50 करोड़ से अधिक जुर्माना माफ करने का आरोप

जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि वर्ष 2016-17 के दौरान नैनीताल के तत्कालीन जिलाधिकारी ने 18 स्टोन क्रशरों पर अवैध खनन और भंडारण के मामलों में लगाए गए करीब 50 करोड़ रुपये से अधिक के जुर्माने को माफ कर दिया। याचिकाकर्ता का दावा है कि जिन मामलों में जुर्माना अधिक था, उन्हीं को माफ किया गया, जबकि कम जुर्माने वाले मामलों में राहत नहीं दी गई।

आरटीआई और सरकारी रिकॉर्ड में अंतर

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता भुवन पोखरिया की ओर से बताया गया कि सचिव खनन द्वारा प्रस्तुत शपथपत्र और आरटीआई के तहत प्राप्त जानकारी में भारी अंतर है। उन्होंने कहा कि जिला खान अधिकारियों और जिलाधिकारी की रिपोर्टों में भी विसंगतियां सामने आई हैं।

याचिकाकर्ता के अनुसार, आरटीआई से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2015-16 में 27, 2016-17 में 58, 2017-18 में 48 और 2018-19 में 11 अवैध खनन एवं भंडारण के मामले दर्ज हुए थे। इनमें से अधिकांश मामलों में जुर्माना या तो शून्य कर दिया गया या काफी कम कर दिया गया।

रिकॉर्ड उपलब्ध न होने पर उठे सवाल

याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि 18 स्टोन क्रशरों से संबंधित जानकारी मांगी गई थी, लेकिन केवल 12 मामलों का ही विवरण दिया गया, जबकि शेष मामलों में रिकॉर्ड उपलब्ध न होने की बात कही गई। इससे पूरे मामले की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

जांच प्रक्रिया पर भी सवाल

याचिका में यह भी कहा गया है कि इस मामले की शिकायत मुख्य सचिव और सचिव खनन से की गई थी, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। बाद में वर्ष 2020 में मुख्य सचिव के निर्देश पर जांच के आदेश दिए गए, लेकिन चार साल बीत जाने के बाद भी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई।

बताया गया कि जांच की जिम्मेदारी पहले जिलाधिकारी नैनीताल को सौंपी गई, जिन्होंने इसे एसडीएम हल्द्वानी को सौंप दिया, लेकिन जांच आगे नहीं बढ़ सकी।

अधिकारों को लेकर भी उठे प्रश्न

याचिकाकर्ता ने यह भी सवाल उठाया है कि जिलाधिकारी को किस नियमावली के तहत अवैध खनन और भंडारण पर लगाए गए जुर्माने को माफ करने का अधिकार प्राप्त है। आरटीआई के जवाब में संबंधित विभाग ने स्पष्ट किया कि इस संबंध में कोई नियम लोक प्राधिकार के अंतर्गत उपलब्ध नहीं है।

कोर्ट से की गई कार्रवाई की मांग

जनहित याचिका में कोर्ट से मांग की गई है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह मामला राज्य के राजस्व को हुए बड़े नुकसान से जुड़ा है, इसलिए इसकी गंभीरता से जांच होना आवश्यक है।

 

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