उत्तराखंडटिहरी गढ़वाल

टिहरी गढ़वाल से प्रकाशित हुई ज्वालामुखी चालीसा, भक्ति और लोकसंस्कृति का अनूठा संगम

टिहरी गढ़वाल: आस्था की धरती उत्तराखंड में धार्मिक-सांस्कृतिक धरोहरों को संजोने की परंपरा निरंतर आगे बढ़ रही है। टिहरी ज़िले के बिनकखाल स्थित प्रसिद्ध माँ ज्वालामुखी सिद्धपीठ अब नई भक्ति रचना के कारण चर्चा में है। पंडित एवं ज्योतिष के मर्मज्ञ कुशलानंद सेमवाल (ग्राम व पोस्ट भिगुन, टिहरी गढ़वाल) और पवन बृजवासी (हाल निवासी लुधियाना) ने मिलकर मां ज्वालामुखी चालीसा की रचना की है, जो भक्तों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बन रही है।

माँ ज्वालामुखी मंदिर बालगंगा एवं धर्मगंगा के संगम क्षेत्र के अग्रभाग में स्थित है। यह सिद्धपीठ देवी दुर्गा के ज्वालामुखी स्वरूप को समर्पित है और सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है।

स्थानीय देवताओं की स्तुति से लेकर ज्वालामुखी चालीसा तक

कुशलानंद सेमवाल पहले भी धार्मिक रचनाओं से क्षेत्र की आध्यात्मिक धरोहर को समृद्ध कर चुके हैं। उन्होंने तिनगढ़ देवता की आरती, गुरूकैलापीर की आरती और अन्य स्थानीय देवी-देवताओं की स्तुतियाँ लिखकर गढ़वाल की आस्था को शब्द दिए हैं। अब ज्वालामुखी चालीसा उनकी रचनात्मक यात्रा का एक नया पड़ाव है।

समाज और संस्कृति से गहरा जुड़ाव

कुशलानंद सेमवाल केवल धार्मिक विद्वान ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों में भी अग्रणी भूमिका निभाते रहे हैं। प्रवासी उत्तराखंडियों को गाँव से जोड़ने के लिए भिगुन गाँव में आयोजित ग्राम मिलन कार्यक्रम में वे सक्रिय रूप से हिस्सा लेते हैं। हाल ही में संपन्न ग्रामोत्सव में उन्होंने सभी ग्रामीणों को मोती की माला और सिर की टोपियाँ भेंट कीं, जिसे लोगों ने बड़ी श्रद्धा और सम्मान से स्वीकार किया।

लुधियाना में भृगु ज्योतिष केंद्र और गढ़-कुमाऊं समिति

प्रवासी उत्तराखंडियों की आस्था और संस्कृति को जीवित रखने के लिए उन्होंने लुधियाना में भृगु ज्योतिष केंद्र की स्थापना की है। इसके साथ ही गढ़-कुमाऊं समिति बनाई है, जो प्रवासी समाज को अपनी जड़ों से जोड़े रखने में अहम भूमिका निभा रही है।

भक्तों और समाज में उत्साह

स्थानीय निवासियों और बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं ने ज्वालामुखी चालीसा को सराहा है। उनका कहना है कि इससे मंदिर की महिमा और भी बढ़ गई है और भक्ति का एक नया स्वरूप सामने आया है। वहीं, उनकी सामाजिक पहल से जुड़ी सक्रियता उन्हें आस्था और संस्कृति दोनों का ध्वजवाहक बनाती है।

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