उत्तराखंड

साहित्यिक मासिक ‘कविकुंभ’ का सातवां वार्षिक दो दिवसीय ‘शब्दोत्सव’

देहरादून।

साहित्यिक मासिक ‘कविकुंभ’ का सातवां वार्षिक दो दिवसीय ‘शब्दोत्सव’ इस बार 28-29 जनवरी को डीआईटी यूनिवर्सिटी देहरादून (उत्तराखण्ड) के वेदांता ऑडिटोरियम में संपन्न हुआ। पहले दिन मुख्य अतिथि डीआईटी चांसलर एन. रविशंकर, कवि-साहित्यकार विभूति नारायण राय, लीलाधार जगूड़ी, दिविक रमेश, इंदु कुमार पांडेय, प्रदीप सौरभ, रंजीता सिंह आदि के दीप प्रज्वलन से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।
सर्वप्रथम परिचर्चा सत्र में, ‘किस दिशा में जा रहा साहित्य और आज क्या दिशा होनी चाहिए !’ विषय पर लीलाधर जगूड़ी, विभूति नारायण राय, दिविक रमेश और प्रदीप सौरभ ने विचार व्यक्त किए।
दिविक रमेश ने कहा, आज का समय बहुत कठिन है। लगता है कि हम बहुत व्यापक और लिजलिज़े दलदल में फँसे हैं। हम दुस्साहस नहीं कर पा रहे हैं। साहित्य दुस्साहस का नाम है। हम अगर अपने समाज को, समय को, अपनी किताबों, अपनी कथाओं में हाशिए के लोगों को व्यक्त नहीं करते तो हम अपने समाज के साथ अन्याय करते है। आज सबसे बड़ी चुनौती अपने समय को व्यक्त करने, अंतरद्वन्द को चित्रित करने की है, और सबसे बड़ी है सत्य बोलने कि चुनौती। यह समय सवाल उठाने का, अपने समय को व्यक्त करने का है।
सुपरिचित उपन्यासकार, पत्रकार प्रदीप सौरभ ने कहा, साहित्य मनुष्यता को बचाता है और साहित्य ही बची हुई मनुष्यता को बेहतर बनाता है। साथ-साथ साहित्य आवाज़ देता है उन्हें, जिनकी आवाज़ होती ही नहीं या जिनके गले को दबा के रखा जाता है। रचना हो जाने के बाद स्वयं रचनाकार के लिए भी एक चुनौती हो जाती है।
वर्धा विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं जाने माने लेखक विभूति नारायण ने कहा, अतीत महत्वपूर्ण भी हो सकता है लेकिन कई बार वभ हमे गहरे दुख में ले जाता है। अतीत के साथ-साथ में हमे ये भी देखना चाहिए कि आज हमारे समाज में औरतों की स्थिति क्या है, वन्य जीवन जीने को अभिशप्त लोग किन हालात से जूझ रहे हैं, अल्पसंख्यक कैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। यह लेखक के लिए अतीत के गौरव गान से ज़्यादा महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि हमारे देश की विविधतापूर्ण, समृद्ध संस्कृति को साहित्यकार ही संरक्षित कर सकते हैं, तभी साहित्य उनकी आवाज़ बनेगा, जो हाशिये पर हैं। पहुँचे हुए लोगों के बारे में सोचेगा और लिखेगा। अंत में वे क़हते हैं कि साहित्य ने ही उन्हें अब तक मनुष्य बना कर रखा है।
अध्यक्षीय सम्बोधन में कवि लीलाधर जगूड़ी ने कहा, अतीत को जाने बिना वर्तमान को नहीं जाना जा सकता है। हिन्दी में आज भी तमाम ऐसे शब्द हैं, जो डिक्शनरी में नहीं हैं। आज की फ़िल्मों तक में नये शब्दों को प्रयोग किया जाता है तो डिक्शनरीज में क्यों नहीं? एक समय पर साहित्य में होड़ हुआ करती थी कि कौन कितने नये शब्द निकालता है, आज ऐसा क्यों संभव नहीं हो पा रहा है, एक बड़ा सवाल है।
परिचर्चा सत्र के बाद कविकुंभ पत्रिका का लोकार्पण हुआ। उसके बाद स्वयं सिद्धा सम्मान समारोह की अध्यक्षता पूर्व कुलपति डॉ सुधा पांडे ने की। मुख्य अतिथि रहे डॉ एस फारुख और गेस्ट ऑफ उत्तराखंड के डीजीपी अशोक कुमार। बीइंग वुमन की ओर से ‘स्वयं सिद्धा सम्मान’ से देश के विभिन्न राज्यों की उन महिलाओं को समादृत किया गया, जिन्होंने स्वयं के श्रम एवं विवेक से समाज में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। राजस्थान से तसनीम खान, मुंबई से जूही राय, उत्तराखंड से सोनिया आनंद रावत, रानू बिष्ट, छत्तीसगढ़ से अनामिका चक्रवर्ती, उत्तर प्रदेश से सलोनी जैन, यामिनी कुशवाहा, पश्चिम बंगाल से शर्मिला भरतरी, दिल्ली से शुभा शर्मा को समादृत किया गया। कार्यक्रम को युवा प्रतिभागी इवा प्रताप सिंह ने शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुत किया।
अलग-अलग कविता-सत्रों में लीलाधर जगूड़ी, इंदु पांडेय, शोभा अक्षर, संजीव कौशल, विमलेश त्रिपाठी, निशांत कौशिक, जयप्रकाश त्रिपाठी, प्रतिमा वत्स, विवेक चतुर्वेदी, रंजीता सिंह, प्रतिभा कटियार, नीलिमा शर्मा, जसवीर त्यागी, संजीव जैन साज, सोमेश्वर पांडेय, राम विनय सिंह, अनामिका चक्रवर्ती, रुचि बहुगुणा उनियाल, विशाल अंधारे, असीम शुक्ला, शिवमोहन सिंह, रघुवीर शरण सहज, राकेश बलूनी, भारती शर्मा आदि ने अपनी सशक्त रचनाओं से अमिट छाप छोड़ी। आयोजन का धन्यवाद ज्ञापन शची नेगी ने लिया।
शब्दोत्सव के दूसरे दिन महिला टाक शो का विषय रहा, ‘साहित्य और समाज के कठघरे में सशक्त स्त्रियां’, जिसमें प्रतिभा कटियार, रंजीता सिंह, जूही राय, संजीव कौशल प्रतिभागी रहे। ‘आधुनिक पत्रकारिता कि चुनौतियां’ विषय पर केंद्रित मीडिया विमर्श में वरिष्ठ पत्रकार सोमवारी लाल उनियाल की अध्यक्षता में नवनीत गैरोला, संजीव कौशल, अनिल चंदौला ने अपने विचार व्यक्त किए।
शाम को रंग-ए-फ़लक (मुशायरा) में सदारत डाक्टर एस फारुख ने की। सहभागी शायर रहे रणविजय सिंह, हसन क़ाज़मी, रंजीता सिंह फ़लक, सीमा शफ़क, प्रेम साहिल, निलोफर नूर, राशिदा बाकी हया, शादाब अली, मीरा नवेली आदि।

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