केदारनाथ में घोड़े-खच्चरों की लीद से बने 25 टन बायो फ्यूल पेलेट्स, अब बढ़ेगा उत्पादन

केदारनाथ यात्रा मार्ग पर स्वच्छता बनाए रखने और वैकल्पिक ईंधन तैयार करने की दिशा में पर्यटन विभाग की पहल को शुरुआती सफलता मिली है। घोड़े-खच्चरों की लीद और चीड़ के पिरूल से बायो फ्यूल पेलेट्स बनाने के पहले चरण में करीब 25 टन सामग्री की प्रोसेसिंग की गई है। अब परियोजना को बड़े स्तर पर संचालित करने की तैयारी है। तैयार पेलेट्स को स्थानीय व्यापारियों तक पहुंचाया जा रहा है।
परियोजना के तहत सोनप्रयाग में बायो फ्यूल पेलेट्स बनाने के लिए मशीनरी स्थापित की गई है। यहां घोड़े-खच्चरों की लीद को चीड़ के पिरूल के साथ मिलाकर उपयोगी ईंधन तैयार किया जा रहा है। पहले चरण में मिली सफलता के बाद अब उत्पादन बढ़ाने और अधिक मात्रा में जैविक कचरे का इस्तेमाल करने पर जोर दिया जा रहा है।
यात्रा मार्ग की गंदगी से मिलेगी राहत
केदारनाथ यात्रा के दौरान पैदल मार्ग पर घोड़े-खच्चरों की लीद जमा होने से श्रद्धालुओं को परेशानी का सामना करना पड़ता है। रास्ते पर गंदगी और फिसलन के कारण यात्रियों के फिसलने और चोटिल होने का खतरा भी बना रहता है। इसके अलावा लीद के अपशिष्ट के आसपास फैलने से पर्यावरण प्रदूषण की आशंका रहती है।
ऐसे में लीद को एकत्र कर उससे बायो फ्यूल तैयार करने की पहल को स्वच्छता और संसाधनों के बेहतर उपयोग से जोड़कर देखा जा रहा है। यदि अगले चरण में उत्पादन बढ़ता है, तो यात्रा मार्ग से अधिक मात्रा में लीद का निस्तारण किया जा सकेगा। इससे रास्तों की सफाई बनाए रखने में मदद मिलने की उम्मीद है।
स्थानीय लोगों को भी मिलेगा लाभ
इस परियोजना से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ने की संभावना है। लीद एकत्र करने और उसे प्रोसेसिंग यूनिट तक पहुंचाने के काम में लोगों को रोजगार मिल सकता है। वहीं, चीड़ का पिरूल उपलब्ध कराने वाले ग्रामीणों को भी आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद है। पिरूल का उपयोग होने से वन क्षेत्रों में जमा इस जैविक सामग्री को उपयोगी उत्पाद में बदलने का अवसर भी मिलेगा।
पर्यटन विभाग के सचिव धीराज गर्ब्याल के अनुसार, परियोजना का पहला चरण सफल रहा है और अब इसे व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाने की तैयारी की जा रही है।
अगले चरण में उत्पादन क्षमता बढ़ाने और तैयार पेलेट्स के उपयोग का दायरा विस्तृत करने पर ध्यान दिया जाएगा। इससे केदारनाथ यात्रा मार्ग पर स्वच्छता की चुनौती से निपटने के साथ स्थानीय संसाधनों से वैकल्पिक ईंधन तैयार करने की पहल को भी मजबूती मिल सकती है।