उत्तराखंडदेहरादून

​उत्तराखंड: काशीपुर का ऐतिहासिक ‘द्रोणसागर’ बनेगा बड़ा पर्यटन केंद्र, ASI ने तैयार किया 90 एकड़ का मास्टर प्लान.

देहरादून (उत्तराखंड)

​उत्तराखंड के काशीपुर में स्थित ऐतिहासिक ‘द्रोणसागर’ (गौविषाण टीला) को लेकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है। लगभग 90 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैले इस प्राचीन और रहस्यमयी स्थल को अब शोध और पर्यटन के एक बड़े केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। वर्षों की वैज्ञानिक खुदाइयों के बाद मिले पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर एएसआई अब इस धरोहर को देश के नक्शे पर चमकाने की तैयारी में है।

महाभारत काल से जुड़ी हैं मान्यताएं ​स्थानीय समाज और लोक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में पांडवों ने अपने गुरु द्रोणाचार्य की स्मृति में यहाँ एक विशाल कुंड का निर्माण कराया था, जिसके कारण इस स्थान का नाम ‘द्रोणसागर’ पड़ा। लंबे समय तक इसे केवल धार्मिक महत्व का स्थल माना जाता रहा, लेकिन जब यहाँ पुरातात्विक सर्वेक्षण शुरू हुए, तो इस मिट्टी के नीचे सदियों पुराना बहुपरतीय (multi-layered) इतिहास सामने आया। वर्तमान में यह स्थल ‘गौविषाण टीला द्रोणासागर’ के नाम से एएसआई की एक संरक्षित साइट है।

​चीनी यात्री ह्वेनसांग और कनिंघम के दस्तावेजों में जिक्र

​देहरादून सर्कल के अधीक्षण पुरातत्वविद् मोहन जोशी के मुताबिक, द्रोणसागर का ऐतिहासिक महत्व बेहद खास है। छठी शताब्दी में भारत आए प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) के यात्रा विवरणों में भी इस क्षेत्र का स्पष्ट उल्लेख मिलता है, जो यह साबित करता है कि उस दौर में भी यह एक प्रमुख सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र था।

​इसके अलावा, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहले महानिदेशक अलेक्जेंडर कनिंघम (Alexander Cunningham) ने भी अपने सर्वेक्षणों में इस स्थल को चिह्नित कर इसके ऐतिहासिक महत्व को दुनिया के सामने रखा था। साल 1939-40 में यहाँ पहली बार व्यवस्थित खुदाई की गई थी, जिसमें प्राचीन ईंटों की दीवारें और मंदिर जैसी संरचनाएं मिली थीं।

खुदाई में मिला गुप्तकालीन ‘पंचायतन मंदिर’

​साल 1960 और 1971-72 के दौरान यहाँ दोबारा आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके से उत्खनन (खुदाई) कराया गया। इस दौरान मिले अवशेषों ने पुरातत्वविदों को हैरान कर दिया। यहाँ एक विशाल ‘पंचायतन शैली’ का मंदिर परिसर मिला।

​क्या है पंचायतन शैली?

भारतीय मंदिर वास्तुकला की इस विशेष शैली में एक मुख्य मंदिर होता है और उसके चारों कोनों पर चार छोटे सहायक मंदिर बनाए जाते हैं। यह शैली विशेष रूप से गुप्तकाल में फली-फूली थी।

​शोध से पता चला है कि यहाँ शुरुआत में गुप्तकाल में ईंटों की एक संरचना बनाई गई थी, जो बाद की शताब्दियों में विकसित होते-होते छठी-सातवीं शताब्दी तक एक भव्य मंदिर परिसर में तब्दील हो गई। यहाँ कुषाण काल और गुप्तकाल दोनों समय की ईंटें और निर्माण शैलियां देखने को मिलती हैं, जिससे यह साफ होता है कि यह स्थल किसी एक दौर में नहीं बल्कि अलग-अलग कालखंडों में धीरे-धीरे समृद्ध हुआ।

​अब पर्यटन और शोध का वैश्विक केंद्र बनेगा द्रोणसागर

​एएसआई अब इस पूरी साइट को पर्यटकों और शोधकर्ताओं के अनुकूल बनाने के लिए तेजी से कदम उठा रहा है। इसके तहत निम्नलिखित कार्य किए जा रहे हैं:

​स्मारकों का संरक्षण: प्राचीन दीवारों और मंदिर परिसर की वास्तुकला को सुरक्षित करना।

​सौंदर्यीकरण: आसपास के जंगलों और झाड़ियों को साफ कर पर्यटकों के लिए सुगम रास्ते बनाना।

​सूचना प्रणाली: यहाँ आने वाले लोगों को इतिहास समझाने के लिए विशेष सूचना बोर्ड और गाइडलाइंस तैयार करना।

​एकेडमिक वर्कशॉप: शोधकर्ताओं और छात्रों के लिए अध्ययन कार्यक्रम और विशेष कार्यशालाएं आयोजित करना।

​अधिकारियों का मानना है कि आने वाले समय में द्रोणसागर न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक पर्यटन स्थलों में शुमार होगा।

​इतिहास, आस्था और विज्ञान का अनूठा संगम

​उत्तराखंड को अब तक केवल देवभूमि की धार्मिक यात्राओं और प्राकृतिक वादियों के लिए ही जाना जाता रहा है, लेकिन द्रोणसागर जैसी साइट्स यह साबित करती हैं कि यह भूमि ऐतिहासिक दृष्टि से भी उतनी ही अनमोल है। काशीपुर का यह टीला आज उस जीवंत सभ्यता का प्रमाण है, जिसकी मिट्टी के नीचे दबी हर एक ईंट हजारों साल पुराने भारत का गौरवशाली इतिहास बयां कर रही है।

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