छोलिया की थाप और शास्त्रीय सुरों से सजी विरासत की शाम, आनंद बर्द्धन ने किया महोत्सव का उद्घाटन
देहरादून में नए स्थल पर शुरू हुआ विरासत आर्ट एंड हेरिटेज फेस्टिवल, लोक कलाकारों और पंडित साजन मिश्रा की प्रस्तुति ने मोहा मन

देहरादून। लोकसंस्कृति की जीवंत छटा और भारतीय शास्त्रीय संगीत की मधुरता के बीच शुक्रवार को देहरादून में विरासत आर्ट एंड हेरिटेज फेस्टिवल का आगाज हुआ। रिच (REACH) संस्था की ओर से आयोजित इस महोत्सव का शुभारंभ मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने किया। इस बार आयोजन के लिए नया स्थल चुना गया है। नींबूवाला स्थित हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र में सजे मंच पर पहले दिन उत्तराखंड की लोकपरंपरा और शास्त्रीय गायकी का अनूठा संगम देखने को मिला।

छोलिया नृत्य से हुआ सांस्कृतिक सफर का आगाज
कार्यक्रम की शुरुआत उत्तराखंड के प्रसिद्ध छोलिया लोकनृत्य से हुई। चंदन बोहरा के नेतृत्व में छोलिया डांस ग्रुप के कलाकारों ने पारंपरिक अंदाज में प्रस्तुति देकर दर्शकों का ध्यान खींचा। लोकनृत्य की लय और कलाकारों की शानदार प्रस्तुति ने पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत को मंच पर साकार कर दिया। उद्घाटन समारोह में छोलिया नृत्य ने प्रदेश की लोककलाओं की विशिष्ट पहचान को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
साजन मिश्रा की गायकी ने जमाया रंग
शाम की सांस्कृतिक प्रस्तुति में पद्म भूषण से सम्मानित पंडित साजन मिश्रा ने अपने सुपुत्र शुरांश मिश्रा के साथ शास्त्रीय गायन पेश किया। तबले पर अभिषेक मिश्रा और हारमोनियम पर पंडित धर्मनाथ मिश्रा ने संगत की। राग-रागिनियों से शुरू हुई इस संगीतमय प्रस्तुति में सुर और ताल का बेहतरीन तालमेल सुनने को मिला। शास्त्रीय संगीत की गंभीरता और मधुर स्वरों ने कार्यक्रम को खास बना दिया।
पंडित साजन मिश्रा बनारस घराने की ख्याल गायकी के प्रमुख प्रतिनिधियों में गिने जाते हैं। इस परंपरा की जड़ें भारतीय शास्त्रीय संगीत के लंबे इतिहास में हैं। मिश्रा बंधु अपनी प्रस्तुतियों के जरिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारतीय संगीत की छाप छोड़ चुके हैं। जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड, मस्कट, कतर और सिंगापुर सहित कई देशों में उनकी प्रस्तुतियां हो चुकी हैं।

परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की पहल
विरासत महोत्सव कला और संस्कृति के विभिन्न स्वरूपों को एक मंच पर लाने का प्रयास है। आयोजन के पहले दिन लोकनृत्य और शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुतियों ने भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं की विविधता को सामने रखा। नए स्थल पर आयोजित इस कार्यक्रम ने देहरादून के सांस्कृतिक कैलेंडर में एक बार फिर विरासत की अहमियत को रेखांकित किया। लोककलाओं के संरक्षण और शास्त्रीय संगीत को प्रोत्साहन देने वाले ऐसे आयोजन सांस्कृतिक धरोहर को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।