
भारतीय साहित्य जगत के लिए यह एक ऐतिहासिक क्षण है। कर्नाटक की मशहूर लेखिका, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता बानू मुश्ताक ने अपनी लघु कहानी संग्रह ‘हार्ट लैंप’ के लिए इंटरनेशनल बुकर प्राइज 2025 जीत लिया है। यह सम्मान उन्हें लंदन के प्रतिष्ठित टेट मॉडर्न में आयोजित समारोह में प्रदान किया गया। यह पहली बार है जब किसी कन्नड़ लघु कथा संग्रह को यह वैश्विक पुरस्कार मिला है।
‘हार्ट लैंप’ को अंग्रेजी में अनुवादित किया है लेखिका और अनुवादक दीपा भस्ती ने, जो कि मडिकेरी की रहने वाली हैं। इस संग्रह की कहानियां समाज के विविध पहलुओं—स्त्री जीवन, आस्था, जातिगत भेदभाव, रूढ़िवादिता, उत्पीड़न और शक्ति संरचना—को गहराई से छूती हैं।
एक साहसी लेखिका की कहानी
बानू मुश्ताक का जन्म 1948 में कर्नाटक के हसन जिले में एक मुस्लिम परिवार में हुआ। 8 वर्ष की उम्र में उनका दाखिला शिवमोग्गा के एक कन्नड़ मिशनरी स्कूल में हुआ, जहां उन्हें शर्त दी गई थी कि 6 महीने में कन्नड़ पढ़ना-लिखना सीखनी होगी। बानू ने न सिर्फ यह चुनौती स्वीकार की बल्कि भाषा पर गहरी पकड़ भी बनाई। यहीं से उनकी साहित्यिक यात्रा की नींव पड़ी।
बचपन से ही उन्होंने समाज की रूढ़ियों से लड़ना शुरू कर दिया। मुस्लिम समुदाय में महिलाओं की शिक्षा को लेकर विरोध के बावजूद उन्होंने कॉलेज तक पढ़ाई की और 26 वर्ष की उम्र में प्रेम विवाह कर लिया, जो उस समय के सामाजिक दायरे को चुनौती देने जैसा था।
पत्रकारिता, वकालत और सामाजिक आंदोलन
बानू ने कानून की पढ़ाई की और साथ ही ‘लंकेश पत्रिके’ जैसे प्रगतिशील अखबार में पत्रकारिता भी की। उन्होंने कुछ समय तक ऑल इंडिया रेडियो में भी काम किया। 1980 के दशक में वे सामाजिक आंदोलनों से जुड़ गईं और कर्नाटक में धार्मिक कट्टरता और सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने लगीं।
2000 में उनके परिवार का सोशल बायकॉट कर दिया गया जब उन्होंने मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश के अधिकार की वकालत की। तीन महीने तक समुदाय ने उनका बहिष्कार किया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इसके बाद वे ‘कोमू सौहार्द वेदिके’ जैसे नागरिक समूहों से जुड़ीं और बाबा बुदनगिरी में सांप्रदायिक तनाव के खिलाफ खड़ी रहीं।
हिजाब विवाद और महिला अधिकारों की हिमायती
बानू मुश्ताक कर्नाटक में हिजाब विवाद के दौरान भी खुलकर मुस्लिम छात्राओं के हक में सामने आईं। उन्होंने बार-बार यह स्पष्ट किया कि महिलाओं को धार्मिक और व्यक्तिगत पहचान की आज़ादी मिलनी चाहिए।
एक वैश्विक मंच पर भारतीय आवाज
पुरस्कार समारोह के दौरान निर्णायक मंडल के अध्यक्ष मैक्स पोर्टर ने कहा, “‘हार्ट लैंप’ एक साहसी, जीवंत और जड़ों से जुड़ा हुआ संग्रह है। इसका अनुवाद भी उतना ही क्रांतिकारी है जितना इसका मूल लेखन।”
बानू ने इस अवसर पर कहा कि, “यह पुरस्कार मेरी व्यक्तिगत पहचान नहीं, बल्कि उस टीम वर्क की पहचान है जिसने इस किताब को एक आवाज दी।” उन्होंने बैलगाड़ी में यात्रा करने के दिनों से लेकर इस मंच तक की यात्रा को भावुकता से याद किया।
निरंतर संघर्ष, अटूट जज़्बा
बानू मुश्ताक सिर्फ लेखिका नहीं हैं—वह एक विचारधारा हैं, जो हर उस आवाज का प्रतिनिधित्व करती हैं जिसे समाज ने दबाने की कोशिश की। उनका लेखन और जीवन, दोनों ही, उन लाखों महिलाओं को प्रेरणा देता है जो रूढ़ियों से लड़कर अपनी पहचान गढ़ना चाहती हैं। ‘हार्ट लैंप’ अब एक किताब नहीं, साहित्यिक प्रतिरोध की मशाल बन गई है।