उत्तराखंड

उत्तराखंड में जंगलों को नुकसान पहुंचाने वालों पर सख्त कार्रवाई, चार महीने में 166 मामले दर्ज

जंगलों की सुरक्षा के लिए कार्रवाई लगातार जारी है, चार महीनों में 166 वन अपराध दर्ज कर कई आरोपियों पर शिकंजा कसा गया।

उत्तराखंड में जंगलों में आग लगाने वालों के खिलाफ इस बार वन विभाग ने सख्त रुख अपनाया है। बीते चार महीनों में वनाग्नि से जुड़े 166 मामले दर्ज किए गए हैं। इनमें उन लोगों पर कार्रवाई की गई है, जिन्हें जंगलों में आग लगाने या आग फैलने के लिए जिम्मेदार माना गया। विभाग का कहना है कि अब केवल आग बुझाने पर ही नहीं, बल्कि इसके पीछे जिम्मेदार लोगों तक पहुंचकर कानूनी कार्रवाई करने पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है।

हर साल गर्मियों में उत्तराखंड के जंगल वनाग्नि की चपेट में आ जाते हैं। सूखी वनस्पतियां, तेज हवाएं और बढ़ता तापमान आग फैलने की वजह बनते हैं, लेकिन जांच में कई बार यह भी सामने आया है कि अधिकांश घटनाओं के पीछे मानवीय लापरवाही या जानबूझकर लगाई गई आग जिम्मेदार होती है। कहीं नई घास उगाने के लिए आग लगाई जाती है तो कहीं शरारती तत्व जंगलों को नुकसान पहुंचाने के इरादे से ऐसा करते हैं। कई मामलों में छोटी सी लापरवाही भी बड़े नुकसान का कारण बन जाती है।

इसी को देखते हुए वन विभाग ने इस बार निगरानी और जांच को पहले से अधिक मजबूत किया। आग लगने की हर घटना की जांच की गई और जिम्मेदार लोगों की पहचान का प्रयास किया गया। चार महीनों में दर्ज 166 मामलों में से 148 मामले वन विभाग ने दर्ज किए, जबकि 18 मामलों में पुलिस में एफआईआर कराई गई।

जांच के दौरान अब तक छह लोगों की पहचान की गई है, जिन पर जंगलों में आग लगाने का संदेह है। इनमें से एक मामला ट्रायल कोर्ट तक पहुंच चुका है। अधिकारियों का मानना है कि यदि ऐसे मामलों में दोषियों को सजा मिलती है तो भविष्य में वनाग्नि की घटनाओं पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।

वन विभाग ने कानूनी कार्रवाई के साथ आर्थिक दंड भी लगाया है। इस वर्ष अब तक दो मामलों में कुल 14,500 रुपये का जुर्माना वसूला गया है। विभाग का मानना है कि जुर्माना और कानूनी कार्रवाई दोनों मिलकर लोगों में जंगलों के प्रति जिम्मेदारी की भावना बढ़ाएंगे।

हालांकि बड़ी संख्या में मामलों की जांच अभी भी जारी है। फिलहाल 146 मामलों की जांच वन विभाग और 17 मामलों की जांच पुलिस कर रही है। जांच पूरी होने के बाद कार्रवाई का दायरा और बढ़ सकता है।

अगर पिछले तीन वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो वनाग्नि की समस्या लगातार चुनौती बनी हुई है। इस अवधि में वन विभाग ने 1,228 मामले दर्ज किए, जबकि 74 मामलों में पुलिस में एफआईआर हुई। वर्ष 2024 सबसे कठिन रहा, जब वन विभाग ने 950 मामले दर्ज किए और 52 एफआईआर कराई गईं। वर्ष 2025 में स्थिति कुछ बेहतर रही और 130 मामले दर्ज हुए, जबकि केवल चार मामलों में पुलिस शिकायत हुई।

दोषियों की पहचान के मामले में भी विभाग की सक्रियता बढ़ी है। वर्ष 2024 में 106 लोगों की पहचान की गई थी, जबकि 2025 में आठ लोगों को चिन्हित किया गया। इस साल भी जांच के आधार पर कार्रवाई लगातार जारी है।

वनाग्नि की घटनाओं में इस वर्ष कुछ कमी जरूर आई है। अब तक राज्य में 580 आग की घटनाएं दर्ज हुई हैं, जिनमें करीब 500.81 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ। इसके बावजूद स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं मानी जा रही, क्योंकि कई घटनाएं चारधाम यात्रा मार्ग और उससे जुड़े संवेदनशील क्षेत्रों में हुईं, जहां श्रद्धालुओं और वाहनों की आवाजाही अधिक रहती है।

गढ़वाल मंडल इस बार सबसे अधिक प्रभावित रहा। कुमाऊं की तुलना में यहां लगभग चार गुना अधिक वन क्षेत्र आग की चपेट में आया। विशेषज्ञ इसकी वजह चीड़ के जंगलों की अधिकता, कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और यात्रा सीजन के दौरान बढ़ने वाली मानवीय गतिविधियों को मान रहे हैं। वन विभाग लोगों से अपील कर रहा है कि जंगलों में किसी भी तरह की लापरवाही न बरतें, क्योंकि छोटी सी चूक भी बड़े पर्यावरणीय नुकसान का कारण बन सकती है।

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