विधायक निधि खर्च में पिछड़ रहे पर्वतीय क्षेत्र, मैदानी इलाकों और विपक्ष के विधायकों की रफ्तार तेज
विकास कोष के उपयोग में दिखा भौगोलिक और राजनीतिक अंतर, कुल उपलब्ध बजट का एक-तिहाई हिस्सा अब भी बकाया

देहरादून: उत्तराखंड में विधायकों को अपने क्षेत्रों में विकास कार्य कराने के लिए मिलने वाली ‘विधायक निधि’ के इस्तेमाल में भारी असमानता देखने को मिल रही है। राज्य के गठन के मूल उद्देश्य यानी पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के दावों के बीच आंकड़े एक अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। प्रदेश में उपलब्ध कुल 1,664 करोड़ रुपये की विधायक निधि में से अब तक केवल 1,091 करोड़ रुपये ही खर्च हो पाए हैं। इसका सीधा अर्थ है कि कुल बजट का करीब 34 प्रतिशत हिस्सा यानी 572 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि अभी भी बिना इस्तेमाल के अटकी हुई है।
निधि के उपयोग के इस आंकड़े को जब राज्य के भूगोल के हिसाब से देखा जाता है, तो पहाड़ी और मैदानी जिलों के बीच बड़ा अंतर नजर आता है। हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में विकास निधि खर्च करने की रफ्तार सबसे तेज है, जहां औसतन प्रति विधायक लगभग 16.88 करोड़ रुपये (करीब 71 प्रतिशत) खर्च किए गए हैं। इसके विपरीत उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पौड़ी, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जैसे पर्वतीय जिलों के विधायकों का औसत खर्च केवल 14.74 करोड़ रुपये (लगभग 62 प्रतिशत) ही दर्ज किया गया है। वहीं देहरादून और नैनीताल जैसे मिश्रित जिलों में यह औसत 15.77 करोड़ रुपये रहा। इस तरह मैदानों की तुलना में पहाड़ों में विकास कार्यों पर बजट खर्च होने की रफ्तार काफी सुस्त पाई गई है।
राजनीतिक आधार पर आंकड़ों का विश्लेषण करने पर भी एक दिलचस्प स्थिति सामने आती है। सत्ता पक्ष के विधायकों की तुलना में मुख्य विपक्षी दल के प्रतिनिधि अपनी निधि का इस्तेमाल करने में थोड़े आगे दिखाई दे रहे हैं। उपलब्ध डेटा के अनुसार, कांग्रेस विधायकों का औसतन खर्च करीब 68.4 प्रतिशत रहा, जबकि सत्तारूढ़ भाजपा के विधायकों का औसत खर्च लगभग 64.4 प्रतिशत दर्ज हुआ। प्रदेश के कुछ विधायकों ने जहां अपनी उपलब्ध निधि का 77 प्रतिशत तक हिस्सा जनहित के कामों में लगा दिया है, वहीं कुछ विधानसभा क्षेत्रों में यह आंकड़ा महज 30 से 44 प्रतिशत के बेहद निचले स्तर पर सिमट कर रह गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य में हर विधायक को सालाना 5 करोड़ रुपये यानी पूरे कार्यकाल के लिए 25 करोड़ रुपये का बड़ा फंड मिलता है। जनप्रतिनिधि अक्सर विकास कार्यों की जरूरतों का हवाला देकर इस फंड को बढ़ाने का दबाव तो बनाते हैं, लेकिन उसे धरातल पर समयबद्ध तरीके से खर्च करने की प्रशासनिक और व्यावहारिक क्षमता में कमी दिखाई देती है। पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन और बुनियादी सुविधाओं के अभाव को देखते हुए पहाड़ी इलाकों के जनप्रतिनिधियों पर इस धन का सही और त्वरित सदुपयोग करने की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा है, ताकि राज्य निर्माण का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सके।