उत्तराखंड के संगीतमय इतिहास को ‘डिजिटल अमरता’ ग्रामोफोन के सुनहरे दौर के 46 दुर्लभ लोकगीत होंगे संरक्षित
'बेड़ू पाको बारामासा' की मौलिक धुनों समेत 1939 से 1979 के बीच रिकॉर्ड हुए ऐतिहासिक गानों को सहेजने की अनूठी पहल

- देहरादून: ‘बेड़ू पाको बारोमासा, नारेणा काफल पाको चैता…’ यह सिर्फ एक लोकगीत नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान की सबसे बुलंद आवाज है। साल 1952 के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों से लेकर देश के प्रतिष्ठित सैन्य आयोजनों और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक को अपनी धुन पर झुमाने वाला यह कालजयी गीत अब अपने सबसे मौलिक रूप में भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित होने जा रहा है।
किसी दौर में काले रंग की भारी-भरकम ‘शेलैक डिस्क’ (तवा रिकॉर्ड) पर रिकॉर्ड किए गए ये गीत केवल संगीत का माध्यम नहीं, बल्कि उत्तराखंड के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का जीवंत दस्तावेज थे। ऑडियो कैसेट, सीडी और फिर डिजिटल क्रांति के आने के साथ ग्रामोफोन रिकॉर्ड बीते जमाने की बात होकर पुरानी पेटियों और कबाड़खानों में गुम हो गए थे। अब इसी संगीतमय इतिहास और लगभग विलुप्त हो चुके 46 ग्रामोफोन लोकगीतों को खोजकर डिजिटल रूप से संरक्षित करने का एक ऐतिहासिक काम शुरू किया गया है।
इस विशेष खोज परियोजना के पीछे सालों की अटूट मेहनत, गहन शोध और लगन छिपी है। देशभर के निजी संग्राहकों से संपर्क साधकर साल 1939 से 1979 के बीच के कुल 21 फिजिकल शेलैक रिकॉर्ड्स प्राप्त किए गए हैं, जिनमें से कई रिकॉर्ड भारत की आजादी यानी 1947 से पहले के हैं। दशकों पुराने होने के कारण इन रिकॉर्ड्स पर घिसावट और बैकग्राउंड नॉइज काफी ज्यादा थी, जिसे अत्याधुनिक डिजिटल रेस्टोरेशन तकनीक के जरिए साफ करके गानों की असली मिठास और स्पष्टता को वापस लौटाया गया है।
आजादी के दौर में उत्तराखंड के दूरस्थ गांवों में जब किसी शादी-ब्याह या मेले के अवसर पर ग्रामोफोन का पीतल का बड़ा हॉर्न बजता था, तो उसकी ‘तवे वाली आवाज’ सुनने के लिए मीलों दूर से पूरा गांव उमड़ पड़ता था। इस डिजिटल संरक्षण अभियान से जीत सिंह नेगी, मोहन उप्रेती, गोपी देवी, गोपाल बाबू गोस्वामी और नईमा खान जैसे कई दिग्गजों और गुमनाम लोक कलाकारों की मौलिक आवाजें हमेशा के लिए अमर हो जाएंगी।