भारत में महिला कार्यबल की संख्या बढ़कर 20.1 करोड़ पहुंची: रिपोर्ट में रोजगार की गुणवत्ता और असमानता को लेकर जताई गई चिंता
आठ वर्षों में लगभग दोगुनी हुई कामकाजी महिलाओं की संख्या; कृषि और अनौपचारिक क्षेत्रों में केंद्रित है बड़ा हिस्सा

हैदराबाद: भारत में महिलाओं की कार्यबल (वर्कफोर्स) में भागीदारी को लेकर एक महत्वपूर्ण अध्ययन सामने आया है। ‘द पार्टिसिपेशन पैराडॉक्स: वीमेन्स वर्क एंड टाइम-यूज इन इंडिया’ शीर्षक से जारी ICRIER की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, देश में महिला कार्यबल की संख्या वर्ष 2017-18 के 10.4 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2025 में 20.1 करोड़ तक पहुंच गई है। हालांकि, महिलाओं की इस बढ़ती भागीदारी के बावजूद रोजगार के अवसरों की प्रकृति और गुणवत्ता को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
अध्ययन के मुताबिक, कार्यबल में महिलाओं का अनुपात 22 प्रतिशत से बढ़कर 38 प्रतिशत हो गया है, लेकिन इस वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा नियमित वेतनभोगी नौकरियों के बजाय ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि, स्व-रोजगार और बिना वेतन वाले पारिवारिक कार्यों से आया है। रिपोर्ट में यह विरोधाभास उजागर किया गया है कि अधिक महिलाएं श्रम बाजार का हिस्सा तो बन रही हैं, लेकिन वे मुख्य रूप से कम उत्पादकता और अनौपचारिक क्षेत्रों में सीमित हैं।
इसके अलावा, रिपोर्ट में लैंगिक वेतन असमानता और घरेलू कार्यभार के अंतर को भी रेखांकित किया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की कमाई पुरुषों की तुलना में महज 45 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है। साथ ही, महिलाएं पुरुषों की तुलना में प्रतिदिन औसतन 3.5 से 4 घंटे अधिक समय बिना वेतन वाले घरेलू और देखभाल संबंधी कार्यों में बिताती हैं।
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि केवल संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि महिलाओं के लिए औपचारिक क्षेत्रों, विनिर्माण और उच्च-उत्पादकता वाली सेवाओं में सुरक्षित और बेहतर वेतन वाले रोजगार के अवसर पैदा करना अनिवार्य है। इसके लिए बाल देखभाल सुविधाओं (क्रेश) के विस्तार, कार्यस्थल पर सुरक्षा और कौशल विकास पर केंद्रित नीतियों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।