उत्तराखंडदेहरादून

उपनलकर्मियों की भर्ती को लेकर कार्मिक ने निकाला खास ऑर्डर।

आदेश में बतया गया है कि जिन पदों पर उपनल कर्मियों की भर्ती होनी है उससे पहले सभी कानूनी और वित्तीय पहलुओं की जांच हो.

उत्तराखंड में उपनल कर्मियों को लेकर कार्मिक विभाग के आदेश ने नई बहस छेड़ दी है. दरअसल, ये आदेश उन पदों को लेकर किया गया है, जिन पर उपनल कर्मी तैनात हैं और सीधी भर्ती के रूप में इन्हें भरा जाना होता है. खास बात ये है कि आदेश में इन पदों के अधियाचन पर सभी विभागाध्यक्षों को अनुमति के बाद ही कदम उठाने के निर्देश जारी हुए हैं.उत्तराखंड में उपनल कर्मियों को लेकर एक बार फिर सियासी और प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है. कार्मिक विभाग के ताजा आदेश ने न सिर्फ विभागों की कार्यप्रणाली पर असर डाला है, बल्कि हजारों उपनल कर्मचारियों के भविष्य को लेकर नई बहस भी छेड़ दी है. यह आदेश खासतौर पर उन पदों से जुड़ा है, जिन पर फिलहाल उपनल कर्मी आउटसोर्स व्यवस्था के तहत कार्यरत हैं, जबकि नियमानुसार इन पदों को सीधी भर्ती के माध्यम से भरा जाना होता है.कार्मिक विभाग की ओर से जारी निर्देशों में स्पष्ट किया गया है कि ऐसे सभी पदों पर अधियाचन भेजने से पहले संबंधित विभागों को कार्मिक, वित्त और न्याय विभाग से अनिवार्य रूप से अनुमति लेनी होगी. इस कदम को प्रशासनिक रूप से एक अहम बदलाव माना जा रहा है, क्योंकि अब तक विभाग सीधे अधियाचन भेजने की प्रक्रिया अपनाते रहे हैं. नए निर्देशों के बाद यह प्रक्रिया अधिक जटिल और बहुस्तरीय हो गई है.दरअसल प्रदेश के विभिन्न विभागों में बड़ी संख्या में उपनल कर्मी वर्षों से कार्यरत हैं. ये कर्मचारी सैनिक कल्याण विभाग के माध्यम से तैनात किए जाते हैं. आउटसोर्स मॉडल पर काम करते हैं, लेकिन जिन पदों पर ये तैनात हैं, वे मूल रूप से स्थायी प्रकृति के हैं. उन्हें नियमित भर्ती प्रक्रिया के जरिए भरा जाना चाहिए. यही वजह है कि समय-समय पर इन पदों पर सीधी भर्ती को लेकर अधियाचन भेजे जाते रहे हैं.

साल 2018 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उपनल कर्मचारियों के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाते हुए उन्हें नियमितीकरण और समान कार्य के लिए समान वेतन देने के निर्देश दिए थे. हालांकि, राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. इससे साफ संकेत मिला कि सरकार तत्काल नियमितीकरण के पक्ष में नहीं थी. बावजूद इसके समान वेतन के मुद्दे पर भी लंबे समय तक असमंजस बना रहा. कर्मचारियों को इसका लाभ मिलने में करीब आठ साल का समय लग गया.

हाल के महीनों में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार ने उपनल कर्मियों को समान कार्य के बदले समान वेतन देने की दिशा में पहल की. इसके तहत कर्मचारियों के साथ नए अनुबंध करने की प्रक्रिया भी शुरू की गई, लेकिन यह प्रस्ताव कर्मचारियों को रास नहीं आया. उनका कहना है कि सरकार अनुबंध के जरिए उनकी सेवाओं को सीमित करना चाहती है, जबकि वे लंबे समय से नियमितीकरण की मांग कर रहे हैं.

अब कार्मिक विभाग का यह नया आदेश इस पूरे विवाद के बीच आया है, जिसने चर्चाओं को और तेज कर दिया है. आदेश में साफ कहा गया है कि जिन पदों पर उपनल कर्मी तैनात हैं और जो सीधी भर्ती के दायरे में आते हैं, उन पर अधियाचन भेजने से पहले सभी कानूनी और वित्तीय पहलुओं की गहन जांच की जाए. इसके लिए तीनों अहम विभागों कार्मिक, वित्त और न्याय की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया है.

इस कदम के पीछे सरकार की मंशा किसी भी संभावित कानूनी विवाद से बचने की हो सकती है. चूंकि, उपनल कर्मियों का मामला पहले से ही न्यायालय में विचाराधीन रहा है, ऐसे में बिना स्पष्ट कानूनी स्थिति के भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाना सरकार के लिए जोखिम भरा हो सकता है. इसलिए अब हर विभाग को पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके प्रस्तावित अधियाचन किसी न्यायिक आदेश या वित्तीय नियमों का उल्लंघन न करें.

दूसरी ओर उपनल कर्मियों के बीच इस आदेश को लेकर अलग ही चर्चा चल रही है. कई कर्मचारी इसे अपनी स्थायी तैनाती की दिशा में एक संभावित संकेत के रूप में देख रहे हैं. उनका मानना है कि यदि सरकार सीधी भर्ती प्रक्रिया को धीमा या जटिल बनाती है, तो इससे मौजूदा कर्मचारियों को बनाए रखने का रास्ता खुल सकता है. इसी आधार पर एक बार फिर कर्मचारियों ने हाईकोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए नियमितीकरण और समान वेतन की मांग तेज कर दी है.

उपनल कर्मचारी नेता विनोद कवि का कहना है कि सरकार को अब स्पष्ट नीति बनानी चाहिए. उनका कहना है कि वर्षों से सेवाएं दे रहे कर्मचारियों को अस्थिरता में रखना न्यायसंगत नहीं है. हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए उन्हें नियमित किया जाना चाहिए.

वहीं, सरकार की ओर से इस आदेश को सकारात्मक पहल के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. कैबिनेट मंत्री खजान दास ने कहा राज्य सरकार लगातार उपनल कर्मियों के हित में काम कर रही है. उनके अनुसार, यह आदेश भी कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए ही जारी किया गया है, ताकि भविष्य में किसी प्रकार की कानूनी या प्रशासनिक बाधा न आए.

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