विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर देहरादून में कार्यशाला आयोजित, विद्यालयों में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य एवं सामाजिक-भावनात्मक शिक्षण को बढ़ावा देने पर जोर
पीएम श्री विद्यालयों के प्रधानाचार्यों एवं शिक्षकों ने लिया प्रशिक्षण; बच्चों में सकारात्मक सोच, आत्मविश्वास और भावनात्मक

देहरादून। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर उत्तराखंड में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक कल्याण तथा सर्वांगीण विकास को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण कार्यशाला का आयोजन किया गया। देहरादून स्थित ट्रांजिट हॉस्टल, रेसकोर्स सेंटर में आयोजित इस कार्यशाला में नैनीताल जनपद के पीएम श्री विद्यालयों के प्रधानाचार्यों एवं शिक्षकों ने प्रतिभाग किया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य विद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील वातावरण विकसित करना, शिक्षकों को विद्यार्थियों की भावनात्मक एवं सामाजिक आवश्यकताओं के प्रति जागरूक बनाना तथा सामाजिक-भावनात्मक शिक्षण को विद्यालयी गतिविधियों का अभिन्न हिस्सा बनाने के लिए प्रेरित करना था।
कार्यक्रम में बंदना गर्ब्याल, निदेशक, अकादमिक शोध एवं प्रशिक्षण मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। वहीं, डॉ. बी. पी. मैंदोली, स्टाफ ऑफिसर, समग्र शिक्षा उत्तराखंड, ने विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रतिभाग किया। कार्यशाला में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न पहलुओं, सकारात्मक सोच के विकास, भावनात्मक संतुलन, आपसी सहयोग, संवेदनशील व्यवहार तथा विद्यालयों में सुरक्षित एवं सहयोगात्मक वातावरण तैयार करने जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।

मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाने पर जोर
कार्यशाला में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य उनके शैक्षिक प्रदर्शन, व्यवहार, आत्मविश्वास, सामाजिक संबंधों और जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करने की क्षमता से गहराई से जुड़ा हुआ है। शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा कराना अथवा परीक्षा परिणामों में सुधार करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का संतुलित एवं समग्र विकास सुनिश्चित करना भी है।
इस दृष्टि से विद्यालयों में ऐसा वातावरण विकसित करना आवश्यक है, जहां प्रत्येक विद्यार्थी स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और स्वीकार्य महसूस करे। बच्चों को अपनी भावनाओं को समझने एवं व्यक्त करने, दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने, कठिन परिस्थितियों में उचित निर्णय लेने और समस्याओं का सकारात्मक समाधान खोजने के अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
कार्यशाला में शिक्षकों को इस बात के लिए प्रेरित किया गया कि वे विद्यार्थियों के व्यवहार में होने वाले बदलावों, सामाजिक अलगाव, असामान्य चुप्पी, आत्मविश्वास में कमी अथवा सीखने में आने वाली कठिनाइयों के प्रति संवेदनशील रहें। ऐसे मामलों में बच्चों को डांटने या उनके व्यवहार को तुरंत अनुशासनहीनता मानने के बजाय उनकी परिस्थितियों को समझने, संवाद स्थापित करने और आवश्यकतानुसार अभिभावकों एवं विशेषज्ञों का सहयोग लेने की आवश्यकता पर बल दिया गया।
मनोदर्पण सेल ने साझा किए मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन के दृष्टिकोण
कार्यशाला में मनोदर्पण सेल के माध्यम से बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य एवं मनोसामाजिक कल्याण से संबंधित विषयों पर चर्चा की गई। प्रतिभागियों को इस दिशा में विद्यालय स्तर पर किए जा सकने वाले प्रयासों के बारे में जानकारी दी गई। संवाद, सकारात्मक प्रोत्साहन, सहपाठी सहयोग, भावनात्मक अभिव्यक्ति तथा तनावपूर्ण परिस्थितियों से निपटने की क्षमता विकसित करने जैसे विषयों को विशेष महत्त्व दिया गया।
यह भी रेखांकित किया गया कि विद्यार्थियों की भावनात्मक आवश्यकताओं को समझना शिक्षकों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। विद्यालयों में ऐसा वातावरण होना चाहिए, जहां बच्चे बिना भय या संकोच के अपनी समस्याएं साझा कर सकें और उन्हें उचित मार्गदर्शन प्राप्त हो। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कठिनाइयों को कलंक या कमजोरी के रूप में देखने के बजाय समय रहते सहायता उपलब्ध कराने की सकारात्मक सोच विकसित करना आवश्यक है।
*सामाजिक-भावनात्मक शिक्षण (SEEL) से होगा विद्यार्थियों का समग्र विकास
कार्यशाला का एक प्रमुख केंद्र सामाजिक-भावनात्मक शिक्षण (Social, Emotional and Ethical Learning—SEEL) रहा। इसके अंतर्गत विद्यार्थियों में आत्म-जागरूकता, भावनात्मक नियंत्रण, सहानुभूति, सहयोग, जिम्मेदारी, संवाद कौशल और सकारात्मक निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने पर चर्चा की गई।
डॉ. बी. पी. मैंदोली, स्टाफ ऑफिसर, समग्र शिक्षा उत्तराखंड, ने शिक्षा में सामाजिक-भावनात्मक शिक्षण को शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों का समग्र विकास तभी संभव है, जब उनकी शैक्षिक उपलब्धियों के साथ-साथ भावनात्मक एवं सामाजिक क्षमताओं के विकास पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाए। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य जितनी ही गंभीरता से लेना आज की आवश्यकता है। शिक्षकों की भूमिका केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें विद्यार्थियों के भीतर संवेदनशीलता, आत्मविश्वास, सहयोग और सकारात्मक सोच विकसित करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देना है। सरकारी प्रयासों के साथ-साथ विद्यालय स्तर पर ऐसे कार्यक्रम बच्चों के व्यक्तित्व को मजबूत बनाने में सहायक हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि सामूहिक प्रयासों के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रत्येक बच्चा विद्यालय में सुरक्षित महसूस करे, उसकी बात सुनी जाए और आवश्यकता पड़ने पर उसे उचित सहयोग एवं मार्गदर्शन मिल सके।
सहयोगी संस्थाओं ने साझा किए अपने अनुभव
कार्यशाला में सहयोगी संस्थाओं Dream a Dream, Labhya Foundation ने भी अपने प्रयासों, अनुभवों और कार्यप्रणालियों को साझा किया। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से विद्यार्थियों के जीवन कौशल, सामाजिक-भावनात्मक क्षमताओं और सकारात्मक व्यवहार को बढ़ावा देने के लिए विद्यालयों में किए जा सकने वाले प्रयासों पर विचार-विमर्श किया गया।
सहयोगी संस्थाओं के अनुभवों ने इस बात को रेखांकित किया कि बच्चों के साथ संवाद, अनुभव-आधारित गतिविधियां, समूह में सीखने के अवसर और सहयोगात्मक व्यवहार को प्रोत्साहित करने वाली प्रक्रियाएं उनके सामाजिक एवं भावनात्मक विकास में उपयोगी हो सकती हैं।
इस प्रकार के प्रयास शिक्षकों को विद्यार्थियों की विविध आवश्यकताओं को समझने तथा कक्षा-कक्ष में अधिक समावेशी, संवेदनशील और सहभागितापूर्ण शिक्षण वातावरण विकसित करने के लिए प्रेरित करते हैं।
विद्यालयों में प्रशिक्षण के व्यावहारिक क्रियान्वयन पर सहमति
कार्यशाला में प्रतिभाग करने वाले प्रधानाचार्यों एवं शिक्षकों ने प्रशिक्षण को उपयोगी बताते हुए इसके दौरान प्राप्त विचारों एवं अनुभवों को अपने विद्यालयों में लागू करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। प्रतिभागियों ने विद्यालयी गतिविधियों में मानसिक स्वास्थ्य, सकारात्मक संवाद, आपसी सहयोग और सामाजिक-भावनात्मक शिक्षण से संबंधित विषयों को स्थान देने की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की।
विद्यालय स्तर पर प्रार्थना सभा, कक्षा-कक्ष की गतिविधियों, समूह चर्चा, सहपाठी सहयोग, रचनात्मक कार्यों तथा विद्यार्थियों के साथ नियमित संवाद के माध्यम से इन अवधारणाओं को व्यवहार में लाया जा सकता है। इसके साथ ही प्रधानाचार्यों एवं शिक्षकों की भूमिका विद्यालय में सम्मानजनक व्यवहार, भेदभाव-मुक्त वातावरण और बच्चों की समस्याओं को संवेदनशीलता से सुनने की संस्कृति विकसित करने में महत्वपूर्ण होगी।
कार्यशाला के माध्यम से यह संदेश भी उभरकर सामने आया कि मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन किसी एक दिवस या कार्यक्रम तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि इसे विद्यालय की नियमित कार्यप्रणाली और शैक्षिक संस्कृति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
*बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की दिशा में सार्थक पहल*
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर आयोजित यह कार्यशाला उत्तराखंड में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य एवं सर्वांगीण विकास को प्राथमिकता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल रही। इससे शिक्षकों एवं विद्यालय प्रमुखों को बच्चों की भावनात्मक आवश्यकताओं को समझने, सकारात्मक व्यवहार को प्रोत्साहित करने और सहयोगात्मक शिक्षण वातावरण विकसित करने के प्रति जागरूक करने का अवसर मिला।
समग्र शिक्षा की भावना के अनुरूप इस प्रकार के प्रशिक्षण विद्यालयों में ऐसी संस्कृति विकसित करने में सहायक हो सकते हैं, जहां शैक्षिक उपलब्धियों के साथ विद्यार्थियों की खुशहाली, आत्मविश्वास, सामाजिक सहभागिता और भावनात्मक सुरक्षा को भी महत्त्व दिया जाए।
कार्यशाला का व्यापक संदेश यही रहा कि प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ ऐसा वातावरण मिलना चाहिए, जिसमें वह अपनी क्षमताओं को पहचान सके, अपनी भावनाओं को समझ सके, दूसरों के प्रति संवेदनशील बन सके और जीवन की चुनौतियों का सामना आत्मविश्वास के साथ कर सके। इसके लिए शिक्षकों, विद्यालय प्रबंधन, अभिभावकों और सहयोगी संस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित करना आवश्यक है।
इस दिशा में निरंतर प्रयास उत्तराखंड के विद्यालयों को अधिक संवेदनशील, समावेशी एवं बाल-केंद्रित बनाने और विद्यार्थियों के स्वस्थ, सुरक्षित तथा उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।