उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में मैदानी जिलों का बड़ा दबदबा: 71 फीसदी हिस्सेदारी पर तीन जिले काबिज, 26 साल में पहाड़ी जनपद पिछड़े
अर्थ एवं संख्या निदेशालय के आंकड़ों ने खोली पोल; हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और देहरादून की आर्थिक हिस्सेदारी सबसे आगे, प्रति व्यक्ति आय में भी बड़ा अंतर

देहरादून: उत्तराखंड राज्य अपने गठन के 26 वर्ष पूरे करने जा रहा है, लेकिन इन ढाई दशकों में विकास की तस्वीर बेहद असंतुलित नजर आ रही है। पर्वतीय राज्यों की आकांक्षाओं के साथ बने इस प्रदेश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा मैदानी और प्रमुख शहरी जिलों तक ही सिमट कर रह गया है। अर्थशास्त्र एवं सांख्यिकी निदेशालय की जिला घरेलू उत्पाद रिपोर्ट (वर्ष 2021-22) के अनुसार, राज्य की कुल अर्थव्यवस्था में केवल तीन जिलों—हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और देहरादून—की हिस्सेदारी करीब 71.3 प्रतिशत है, जबकि बाकी बचे 10 पर्वतीय और मैदानी जिलों का कुल योगदान महज 28.7 प्रतिशत ही है।
आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के औद्योगिक क्षेत्र में यह खाई और भी गहरी है। औद्योगिक सकल मूल्य संवर्धन में अकेले इन तीन जिलों की हिस्सेदारी करीब 85.9 प्रतिशत है, जबकि नौ पर्वतीय जिलों का कुल औद्योगिक योगदान मात्र 8.6 प्रतिशत के आसपास है। आर्थिक रूप से देखें तो हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे दो मैदानी जिलों की संयुक्त अर्थव्यवस्था, सभी नौ पर्वतीय जिलों (उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी, पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा और चंपावत) की कुल अर्थव्यवस्था से लगभग ढाई गुना से अधिक बड़ी है।
प्रति व्यक्ति आय के मामले में भी भारी असमानता देखने को मिलती है। मैदानी जिला हरिद्वार इस सूची में सबसे आगे है, जबकि पहाड़ी जिला रुद्रप्रयाग सबसे पीछे है। रिपोर्ट के अनुसार, हरिद्वार की प्रति व्यक्ति आय रुद्रप्रयाग की तुलना में लगभग 3.9 गुना अधिक है। हालांकि, कृषि, बागवानी और वानिकी जैसे प्राथमिक क्षेत्रों में पर्वतीय जिलों की स्थिति मजबूत है, लेकिन स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग जैसी सुविधाओं के अभाव में वहां के उत्पादों का पूरा आर्थिक लाभ स्थानीय आर्थिकी को नहीं मिल पाता है।
विशेषज्ञों और राज्य आंदोलनकारियों का मानना है कि पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन रोकने और संतुलित विकास सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकारों को मैदानी और पहाड़ी जिलों के बीच की इस आर्थिक खाई को पाटने हेतु ठोस और धरातलीय नीतियां बनानी होंगी, ताकि राज्य गठन का मूल उद्देश्य पूरा हो सके।