
देहरादून: उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत ने अपने निजी सहायक के आवास पर हुई प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई के बाद चुप्पी तोड़ी है। सोशल मीडिया पर एक विस्तृत पोस्ट साझा करते हुए उन्होंने अपने सहयोगी का बचाव किया और स्पष्ट किया कि उन्होंने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में कभी किसी काम या पद के बदले पैसे नहीं लिए। इसके साथ ही उन्होंने राज्य सरकार और जांच एजेंसियों को अपने तीन साल के मुख्यमंत्रित्व काल की फिर से जांच कराने की खुली चुनौती दी है।
सहयोगी के समर्थन में आए पूर्व सीएम
ईमानदारी का दावा: पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने सहयोगी का पक्ष लेते हुए कहा कि वे 1991 से उनके साथ निष्ठा और ईमानदारी से काम कर रहे हैं।
संस्थाओं की स्वायत्तता: उन्होंने कहा कि उनके मुख्यमंत्री रहने के दौरान अधीनस्थ सेवा चयन आयोग और लोक सेवा आयोग जैसी संस्थाओं के कामकाज में कभी अनुचित हस्तक्षेप नहीं किया गया।
सरकार और एजेंसियों को चुनौती
फाइलों की फिर से जांच की मांग: उन्होंने कहा कि वे तीन साल राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं, इसलिए सरकार को उनके कार्यकाल की फाइलों को एक बार फिर खंगालना चाहिए ताकि सच सामने आ सके।
12 लाख रुपये और आर्थिक सहयोग पर सफाई
इलाज और खर्चों के लिए मिली मदद: रावत ने बताया कि जब वे बीमार होकर दिल्ली और गुड़गांव के अस्पताल में इलाज करा रहे थे, तब उनके शुभचिंतकों और समर्थकों ने घर चलाने, किराया और चिकित्सा खर्च उठाने के लिए आर्थिक मदद दी थी।
रकम का हिसाब: अस्पताल से आवास लौटने के समय उनके पास मौजूद 12 लाख रुपये समर्थकों द्वारा दी गई सहयोग राशि थी, जिसे बैंक खातों में समायोजित करने में समय लगता है।
“काम के बदले कभी नहीं लिए पैसे”
हरीश रावत ने जोर देकर कहा कि अपने लंबे राजनीतिक करियर में उन्होंने चुनाव लड़ने और जनसेवा के दौरान ‘लोग कमाए हैं, पैसा नहीं’। उन्होंने कभी किसी का काम करने के बदले कोई ‘सर्विस चार्ज’ या राशि नहीं ली। उन्होंने उत्तराखंड की जनता से इस पूरे घटनाक्रम पर गंभीरता से विचार करने का आग्रह किया है।