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अव्यवस्थाओं में घिरा उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय, PCS अधिकारी ने पद छोड़ने की जताई इच्छा

सालों से परीक्षा परिणाम का इंतजार कर रहे BAMS छात्रों का आंदोलन तेज, गैर-काउंसलिंग दाखिलों से लेकर विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली तक उठ रहे सवाल

देहरादून: उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। विश्वविद्यालय में लंबे समय से चल रही अव्यवस्थाओं का असर जहां छात्रों के भविष्य पर पड़ रहा है, वहीं अब यहां तैनात कुलसचिव ने भी अपने पद से हटने की इच्छा शासन के सामने जाहिर की है। कुलसचिव शिव कुमार बरनवाल ने कार्मिक विभाग को पत्र भेजकर जिम्मेदारी से मुक्त किए जाने का अनुरोध किया है। उन्होंने इसके पीछे विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली से जुड़ी समस्याओं के साथ अपने स्वास्थ्य का भी हवाला दिया है।      छात्रों के आंदोलन ने खोली व्यवस्थाओं की पोल          उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय में BAMS के सैकड़ों छात्र पिछले कई दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। छात्रों की सबसे बड़ी शिकायत परीक्षा परिणामों को लेकर है। उनका आरोप है कि कई वर्षों से परीक्षा देने के बावजूद उनके परिणाम जारी नहीं किए जा रहे हैं।

छात्रों का कहना है कि उन्होंने कॉलेजों में दाखिला लेने के बाद निर्धारित फीस जमा की और परीक्षाओं में भी हिस्सा लिया, लेकिन अब परिणाम जारी नहीं होने के कारण उनकी पढ़ाई और भविष्य दोनों प्रभावित हो रहे हैं। कई छात्र आगे की पढ़ाई, इंटर्नशिप और रोजगार के लिए अपनी डिग्री का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं।

कुलसचिव ने शासन को लिखा पत्र

विश्वविद्यालय की मौजूदा स्थिति के बीच कुलसचिव शिव कुमार बरनवाल ने कार्मिक विभाग को पत्र लिखकर पद से हटने की इच्छा जताई है। पत्र में उन्होंने विश्वविद्यालय में मौजूद विभिन्न प्रशासनिक समस्याओं का उल्लेख किया है। साथ ही उन्होंने अपने स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता जाहिर की है।          बताया जा रहा है कि कुलसचिव के सामने छात्रों के लंबित परीक्षा परिणामों के अलावा विश्वविद्यालय से जुड़े कई अन्य मामलों को लेकर भी लगातार दबाव बना हुआ है।                                                  पुराने परीक्षा परिणामों पर भी उठे सवाल

मामले का एक अहम पहलू यह है कि कुछ छात्रों के उन वर्षों के परीक्षा परिणामों पर भी मौजूदा कुलसचिव को हस्ताक्षर करने पड़ रहे हैं, जब वह विश्वविद्यालय में तैनात ही नहीं थे।

इसके अलावा गैर-काउंसलिंग प्रक्रिया के जरिए छात्रों के दाखिले का मामला भी विश्वविद्यालय के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। आरोप है कि कुछ आयुर्वेद कॉलेजों ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना छात्रों को प्रवेश दिया।                                     करीब आठ कॉलेजों पर नियमों के विपरीत दाखिले का आरोप।                                                       पूरे मामले में करीब आठ आयुर्वेद कॉलेजों पर नियमों के खिलाफ दाखिले करने के आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि इन संस्थानों ने काउंसलिंग प्रक्रिया के बाहर छात्रों का प्रवेश कराया और उनसे फीस भी ली।

मामला सामने आने के बाद इन छात्रों के भविष्य पर संकट खड़ा हो गया है। हालांकि, हाईकोर्ट से छात्रों को परीक्षा में शामिल होने की अनुमति मिल गई थी, लेकिन परीक्षा परिणाम अब तक जारी नहीं हो सके हैं।

4 से 6 साल बाद भी परिणाम का इंतजार

बताया जा रहा है कि कुछ मामलों में छात्रों को परीक्षा दिए चार से छह वर्ष तक का समय बीत चुका है, लेकिन परिणाम घोषित नहीं किए गए हैं। ऐसे में छात्र न तो अपनी डिग्री प्राप्त कर पा रहे हैं और न ही उच्च शिक्षा या रोजगार के लिए आगे बढ़ पा रहे हैं।

यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि दाखिले निर्धारित नियमों और काउंसलिंग प्रक्रिया के तहत नहीं हुए थे, तो संबंधित छात्रों को परीक्षा में शामिल होने की अनुमति किस आधार पर दी गई। इस पूरे प्रकरण में कॉलेजों की भूमिका के साथ विश्वविद्यालय की निगरानी व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है।

छात्रों का सवाल- गलती हमारी है तो सजा क्यों?आंदोलन कर रहे छात्रों का कहना है कि दाखिले के समय कॉलेजों ने उन्हें पूरी प्रक्रिया सही होने का भरोसा दिया था। उन्होंने निर्धारित फीस जमा की और विश्वविद्यालय की परीक्षाएं भी दीं।

छात्रों ने विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि BAMS पाठ्यक्रम के शुरुआती वर्षों के परीक्षा परिणाम जारी किए गए, जबकि बाद के वर्षों के परिणाम रोक दिए गए हैं। उनका सवाल है कि यदि दाखिले शुरू से ही नियमों के विपरीत थे, तो पहले वर्षों की परीक्षाओं के परिणाम किस आधार पर जारी किए गए?

कॉलेजों को नोटिस, कार्रवाई की चेतावनी

कुलसचिव शिव कुमार बरनवाल के मुताबिक, ऐसे कॉलेजों को नोटिस जारी किए गए हैं, जिन्होंने कथित तौर पर निर्धारित काउंसलिंग प्रक्रिया के बाहर छात्रों का दाखिला कराया। उनका कहना है कि यदि किसी संस्थान की ओर से छात्रों को विश्वविद्यालय के खिलाफ आंदोलन के लिए उकसाने की बात सामने आती है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर संबंधित कॉलेजों की मान्यता या संबद्धता पर भी कार्रवाई की जा सकती है।

फिलहाल छात्रों का आंदोलन जारी है और परीक्षा परिणामों को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि दाखिले से लेकर परीक्षा और परिणाम तक की पूरी प्रक्रिया में जिम्मेदारी किसकी थी और वर्षों से अटके छात्रों के भविष्य का समाधान कब निकलेगा।

 

 

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