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विधानसभा के बाहर गूंजी गैरसैण की मांग, स्थायी राजधानी के लिए निकली आक्रोश पदयात्रा

पदयात्रा को रोकने की प्रशासन ने की कोशिश, प्रदर्शनकारियों ने गैरसैण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग दोहराई।

उत्तराखंड की स्थाई राजधानी गैरसैण के मुद्दे को लेकर आज ‘स्थाई राजधानी गैरसैण समिति’ ने अस्थाई राजधानी देहरादून की विधानसभा से एक ऐसी ऐतिहासिक और आक्रोशित पदयात्रा निकाली, जिसने सूबे के सियासी गलियारों को हिलाकर रख दिया है। तपती और कड़कड़ाती धूप के बीच जनता में अलख जगाने के उद्देश्य से निकाली गई यह लंबी पदयात्रा आने वाले दिनों में देहरादून से गैरसैण के महा-कूच में तब्दील होने जा रही है। यात्रा के दौरान उस समय भारी तनाव की स्थिति पैदा हो गई जब शासन-प्रशासन के इशारे पर पुलिस और सुरक्षा गार्डों ने आंदोलनकारियों को रोकने की पुरजोर कोशिश की और मंत्रियों व वीआईपी आवासों वाली डिफेंस कॉलोनी के रास्ते से पदयात्रा निकालने पर पाबंदी लगाने का प्रयास किया। लेकिन आंदोलनकारियों के अडिग हौसले और सूझबूझ के आगे सरकारी तंत्र बेअसर साबित हुआ; मौके पर गतिरोध बढ़ता देख जब डिफेंस कॉलोनी के सेक्रेटरी को फोन घुमाया गया, तब जाकर प्रशासन और मैनेजमेंट को रास्ता देने की अनुमति देनी पड़ी। इस दौरान पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह व आंदोलन के शीर्ष नेता पूर्व IAS विनोद प्रसाद रतुड़ी प्रशासन के सामने चट्टान की तरह अड़ गए राजधानी गैरसैण के गगनभेदी नारों के साथ उसी डिफेंस कॉलोनी के रास्ते से पूरे स्वाभिमान के साथ आगे बढ़ गए।

 

18 वर्षीय युवा आंदोलनकारी पार्थ रतुड़ी, जिन्होंने कहा कि हमारे पहाड़ों के नसीब में सिर्फ जंगली जानवरों का खौफ, जड़ी-बूटियों का संघर्ष और दैवीय आपदाओं की मार लिख दी गई है, और इस पूरे पहाड़ की मलाई और तरक्की को डकारने के लिए यह पूरी सरकार देहरादून के वातानुकूलित कमरों में बैठी हुई है, पार्थ रतुड़ी ने पूछा कि क्या इन राजनेताओं को थोड़ी सी भी आत्मग्लानी या शर्म महसूस नहीं होती, जिनकी खुद की विधानसभा तक आज तक स्थाई नहीं हो पाई? तुम खुद तो AC की ठंडी हवा खा रहे हो और पहाड़ की तरफ जब देखते भी हो, तो विकास की नजर से नहीं बल्कि सिर्फ अपने गंदे और लालची वोट बैंक की नजर से देखते हो। उन्होंने कहा भाजपा और कांग्रेस दोनों मुख्य दलों ने विकास किया है इसमें कोई सक नहीं पर अपने सियासी फायदे के लिए, अगर ऐसा नहीं होता तो आज राज्य बनने के 26 साल बाद भी हमारी आने वाली पीढ़ी को अपनी ही राजधानी गैरसैण के लिए इस तरह सड़कों पर धूप में नहीं तपना पड़ता।

 

इसी क्रम में डीएवी  कॉलेज के पूर्व महासचिव सचिन थपलियाल ने देहरादून के ढांचे पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि यह देहरादून एक नकली, थोपी गई और कलंकित राजधानी है, जिसने कभी हमारे पहाड़ के वास्तविक विकास की बात ही नहीं की और इस फर्जी विधानसभा ने उत्तराखंड के युवाओं का भविष्य खा लिया है। इस आंदोलन की गूंज अब दिल्ली तक पहुंच चुकी है, जहां से सुनील जडली और अनिल बहुगुणा अपने साथियों के साथ विशेष रूप से इस पदयात्रा में शामिल होने पहुंचे। इस ऐतिहासिक और व्यवस्था-विरोधी महा-आंदोलन में उत्तराखंड के कई जाने-माने चेहरे, पूर्व सैन्य अधिकारी और प्रबुद्ध नागरिक जैसे पूर्व IAS एस.एस. पांकती, पार्थ रतुड़ी, प्रकाश थपलियाल, ब्रिगेडियर सर्वेश डंगवाल, कैप्टन राकेश ध्यानी, लक्ष्मी प्रसाद रतुड़ी, जगदीश ममगाईं, राजेन्द्र प्रसाद कण्डवाल, रमेश थपलियाल, आनंद राम, सुधीर गैरोला, मनमोहन शर्मा, अवधेश शर्मा और सत्य प्रकाश कोठियाल सहित सैकड़ों की संख्या में मातृशक्ति और युवा एकजुट रहे। समिति ने साफ चेतावनी दी है कि यह पदयात्रा तो महज एक चिंगारी थी, बहुत जल्द देहरादून से गैरसैण तक का ऐसा दावानल धकेगा जिसे बुझाना इस गूंगी-बहरी सरकार के बस की बात नहीं होगी।

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