नेपाल रूट पर संकट के बीच उत्तराखंड के लिपुलेख की बढ़ी अहमियत
रसुवागढ़ी-केरुंग कॉरिडोर प्रभावित होने के बाद कैलाश यात्रा के लिए वैकल्पिक रास्तों पर बढ़ी चर्चा, 2026 में लिपुलेख से 477 यात्रियों ने पूरी की यात्रा।

देहरादून: नेपाल में 26 अगस्त को आई प्राकृतिक आपदा के बाद कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रमुख मार्गों को लेकर नई परिस्थितियां सामने आई हैं। रसुवा जिले में बाढ़ और मलबे से नेपाल-चीन सीमा के पास रसुवागढ़ी क्षेत्र में सड़क और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा। इस मार्ग से बड़ी संख्या में श्रद्धालु तिब्बत पहुंचते हैं। ऐसे में भारत के उत्तराखंड स्थित लिपुलेख मार्ग की उपयोगिता को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
रसुवागढ़ी मार्ग पर आपदा से बढ़ी चिंता
रसुवागढ़ी-केरुंग मार्ग कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए नेपाल से होकर तिब्बत जाने वाले प्रमुख रास्तों में शामिल है। आपदा के समय करीब 390 कैलाश यात्रियों के सीमा पार करने की तैयारी में होने की जानकारी सामने आई थी। अचानक आई बाढ़ और मलबे के कारण क्षेत्र का संपर्क और परिवहन ढांचा प्रभावित हुआ, जिससे इस कॉरिडोर पर निर्भर यात्रियों की मुश्किलें बढ़ गईं।
नेपाल के उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि इस मार्ग से कैलाश यात्रा की लोकप्रियता लगातार बढ़ी है। वित्त वर्ष 2025-26 में रसुवागढ़ी सीमा से 13,523 धार्मिक पर्यटक तिब्बत की ओर गए। इससे एक साल पहले यह आंकड़ा 11,387 था। यानी एक साल में यात्रियों की संख्या में करीब 18.75 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
नेपाल के रास्ते बढ़ी कैलाश यात्रा की मांग
नेपाल के रास्ते कैलाश मानसरोवर जाने की मांग केवल भारतीय श्रद्धालुओं तक सीमित नहीं है। निजी टूर ऑपरेटरों के जरिए भारतीयों के साथ दूसरे देशों के नागरिक भी इस यात्रा पर जाते हैं। 2026 के लिए नेपाल के रास्ते भारतीय पासपोर्ट धारकों के लिए चीन ने 24 हजार यात्रियों तक की सीमा तय की थी। पर्यटन क्षेत्र से जुड़े लोगों के मुताबिक वास्तविक मांग इससे कहीं अधिक रही और करीब 40 हजार लोगों की रुचि सामने आने की बात कही गई।
हालांकि नेपाल और भारत के आधिकारिक यात्रा आंकड़ों की सीधी तुलना करना उचित नहीं होगा। नेपाल के रास्ते निजी ऑपरेटरों के माध्यम से अलग-अलग देशों के यात्री यात्रा करते हैं, जबकि भारत की सरकारी कैलाश मानसरोवर यात्रा पात्र भारतीय नागरिकों के लिए निर्धारित व्यवस्था के तहत होती है।
भारत में पहले से मौजूद है लिपुलेख मार्ग
कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए भारत के पास उत्तराखंड का लिपुलेख और सिक्किम का नाथू ला, दो आधिकारिक मार्ग हैं। इनमें पिथौरागढ़ जिले से होकर जाने वाला लिपुलेख मार्ग लंबे समय से इस्तेमाल में है। यात्रा धारचूला से आगे उच्च हिमालयी क्षेत्र की ओर बढ़ती है और गुंजी, कालापानी होते हुए लिपुलेख तक पहुंचती है। इसके बाद यात्री तिब्बत में प्रवेश करते हैं।
विदेश मंत्रालय की 2026 की व्यवस्था के तहत लिपुलेख मार्ग से 10 बैच निर्धारित किए गए थे। इस रूट पर पूरी यात्रा में करीब 22 दिन लगते हैं और प्रति यात्री अनुमानित खर्च लगभग 2.09 लाख रुपये था।
लिपुलेख मार्ग के सामने सबसे बड़ा सवाल इसकी यात्री क्षमता को लेकर है। 2026 में इस रास्ते से 477 यात्रियों ने कैलाश मानसरोवर यात्रा पूरी की। वहीं सिक्किम के नाथू ला मार्ग से 464 यात्री गए। दोनों रास्तों को मिलाकर सरकारी व्यवस्था के तहत कुल 941 यात्रियों ने यात्रा की।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि नेपाल के रास्ते यात्रा करने वाले लोगों की संख्या और भारत के आधिकारिक मार्गों की मौजूदा क्षमता में काफी अंतर है। ऐसे में केवल नेपाल का रास्ता प्रभावित होने से लिपुलेख को तुरंत बड़े पैमाने के विकल्प में बदलना आसान नहीं होगा। इसके लिए सड़क, आवास, चिकित्सा सुविधा, सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और ऊंचाई वाले इलाकों में यात्रा क्षमता जैसे कई पहलुओं पर काम करना होगा।
लिपुलेख मार्ग को मजबूत करने का लाभ केवल कैलाश मानसरोवर यात्रा तक सीमित नहीं रहेगा। पिथौरागढ़ के सीमांत इलाकों में आदि कैलाश, पार्वती कुंड और ओम पर्वत पहले से ही श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं। इन स्थानों पर धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के प्रयास भी जारी हैं।