जलवायु परिवर्तन का बड़ा खतरा: उत्तराखंड में 2050 तक 70% तक घट सकते हैं छोटे कृषि-वनीकरण क्षेत्र
बढ़ते तापमान और अनिश्चित बारिश से मध्य ऊंचाई वाले क्षेत्रों पर मंडराया संकट, शोध में सामने आए चिंताजनक आंकड़े

देहरादून: उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक खेती और पर्यावरण संतुलन का मुख्य आधार मानी जाने वाली ‘कृषि-वनीकरण’ (एग्रोफोरेस्ट्री) प्रणाली पर जलवायु परिवर्तन का गंभीर साया मंडरा रहा है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि समय रहते जलवायु जोखिमों से निपटने के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए, तो वर्ष 2050 तक राज्य के छोटे और बिखरे हुए कृषि-वनीकरण क्षेत्रों में 60 से 70 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आ सकती है। वहीं, बड़े पैमाने पर फैले कृषि-वनीकरण क्षेत्रों में भी 10 से 20 प्रतिशत तक की कमी आने की आशंका जताई गई है।
अध्ययन के अनुसार, उत्तराखंड के मध्य ऊंचाई वाले इलाकों और पूरी तरह बारिश पर निर्भर कृषि क्षेत्रों को जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील पाया गया है। 1,100 से 1,600 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्र, जहां वर्तमान में कृषि-वनीकरण का सबसे बड़ा हिस्सा मौजूद है, नमी में कमी, बढ़ते तापमान और मौसम के अनिश्चित चक्र से सीधे प्रभावित हो रहे हैं। छोटे और अलग-थलग पड़े खेतों में जैविक सुरक्षा क्षमता कम होने के कारण वहां मिट्टी की नमी तेजी से घट रही है, जिससे फसलों और पेड़ों का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है।
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में कृषि-वनीकरण सिर्फ खेती की एक तकनीक नहीं है, बल्कि यह स्थानीय आबादी की आजीविका, ईंधन, चारा, फल और औषधीय जरूरतों को पूरा करने वाली मुख्य जीवनरेखा है। खेतों के आसपास मौजूद पेड़ ढलानों को स्थिर रखते हैं और मिट्टी के कटाव को रोकते हैं। ऐसे में जलवायु संकट के कारण इन क्षेत्रों के घटने से न केवल पर्वतीय पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा, बल्कि स्थानीय किसानों की आत्मनिर्भरता पर भी गहरा असर पड़ेगा।
हालांकि, अध्ययन में इस चुनौती से निपटने और भूमि सुधार की व्यापक संभावनाओं को भी रेखांकित किया गया है। राज्य में हजारों वर्ग किलोमीटर ऐसी बंजर और परती भूमि चिह्नित की गई है, जिसे वैज्ञानिक प्रबंधन के जरिए पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसके लिए जल संचयन, सूखा और गर्मी सहने वाली स्थानीय पेड़ प्रजातियों का रोपण, ढलानों पर संरक्षण खेती और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई गई है, ताकि इस संकट को समय रहते नियंत्रित किया जा सके।