उत्तराखंडदेहरादून

न्यूज बुलेटिन एक्सक्लूसिव : तपोवन जलोत्सारण योजना में खामियों पर ठेकेदार पर 6.16 लाख की पेनल्टी

पूर्व अधिशासी अभियंता को दिया गया था कारण बताओ नोटिस, जवाब न मिलने पर हुई कार्रवाई

देहरादून। तपोवन जलोत्सारण योजना के अंतर्गत संचालित सीवेज पंपिंग स्टेशन और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में पाई गई गंभीर तकनीकी एवं रखरखाव संबंधी खामियों के मामले में उत्तराखंड जल संस्थान ने ठेकेदार पर 6 लाख 16 हजार रुपये की पेनल्टी लगाई है। यह कार्रवाई अधिशासी अभियंता अनुरक्षण शाखा, गंगा उत्तराखंड जल संस्थान हरिद्वार की ओर से की गई।
मामले की शुरुआत उस समय हुई जब योजना के निरीक्षण के दौरान सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं में कई अनियमितताएं और खामियां सामने आईं। इन कमियों को गंभीरता से लेते हुए तत्कालीन अधिशासी अभियंता हरीश बंसल को डीएम टिहरी की ओर से कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। विभागीय सूत्रों के अनुसार नोटिस में योजना के संचालन, अनुरक्षण और कार्यों की गुणवत्ता को लेकर कई सवाल उठाए गए थे, लेकिन निर्धारित समयावधि में उनकी ओर से कोई संतोषजनक जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया।

 

इसके बाद 19 मई 2026 को कार्यभार ग्रहण करने वाले अधिशासी अभियंता अजय कुमार ने मामले का संज्ञान लिया। उन्होंने पूर्व में जारी पत्राचार, निरीक्षण रिपोर्टों और कारण बताओ नोटिस से जुड़े दस्तावेजों का परीक्षण कराया। जांच में सामने आई खामियों को गंभीर मानते हुए संबंधित ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति की गई।विभागीय कार्रवाई के तहत अधिशासी अभियंता अनुरक्षण शाखा, गंगा उत्तराखंड जल संस्थान हरिद्वार द्वारा ठेकेदार पर 6.16 लाख रुपये की आर्थिक पेनल्टी लगाई गई। बताया जा रहा है कि निरीक्षण के दौरान जिन खामियों का उल्लेख किया गया था, उनमें उपकरणों के रखरखाव, संचालन व्यवस्था और अनुबंध की शर्तों के पालन से जुड़े कई बिंदु शामिल थे।
तपोवन जलोत्सारण योजना वर्ष 2015-16 में निर्मित की गई थी और वर्तमान में इसका संचालन उत्तराखंड जल संस्थान द्वारा किया जा रहा है। योजना के अंतर्गत सीवेज पंपिंग स्टेशन, राइजिंग मेन और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट संचालित हैं तथा सैकड़ों उपभोक्ता इससे जुड़े हुए हैं।अब इस कार्रवाई के बाद विभागीय कार्यप्रणाली और योजना के रखरखाव को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। चर्चा इस बात की भी है कि यदि निरीक्षण में इतनी गंभीर खामियां सामने आई थीं तो उनके निराकरण में देरी क्यों हुई और जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की जाएगी। विभागीय हलकों में यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है।

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