भू-तापीय ऊर्जा की दिशा में उत्तराखंड का बड़ा कदम, तकनीक सीखने लद्दाख और आइसलैंड जाएगी विशेषज्ञों की टीम
प्रदेश में चिन्हित 40 जियोथर्मल स्प्रिंग्स से बिजली बनाने की तैयारी, तपोवन में जल्द शुरू होगी ड्रिलिंग
देहरादून: उत्तराखंड सरकार राज्य में ऊर्जा आपूर्ति को मजबूत करने और हरित ऊर्जा के नए विकल्पों को तराशने के लिए भू-तापीय (जियोथर्मल) ऊर्जा के दोहन पर तेजी से काम कर रही है। राज्य के उच्च हिमाली क्षेत्रों में मौजूद प्राकृतिक गर्म पानी के स्रोतों (जियोथर्मल स्प्रिंग्स) से बिजली उत्पादन और हीटिंग सिस्टम विकसित करने की दिशा में व्यापक योजना तैयार की गई है। इस नई तकनीक को बारीकी से समझने और राज्य के तकनीकी कर्मचारियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण देने के लिए ऊर्जा विभाग जल्द ही एक दल को लद्दाख और आइसलैंड भेजने जा रहा है।
हिमालयी क्षेत्र में हुए विभिन्न अध्ययनों के अनुसार उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों में लगभग 40 प्रमुख भू-तापीय स्रोत चिन्हित किए गए हैं। इन प्राकृतिक स्रोतों की क्षमता का सही इस्तेमाल कर इनसे टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा प्राप्त करने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाए जा रहे हैं। इसी कड़ी में चमोली जिले के तपोवन स्थित भू-तापीय स्रोत का प्राथमिक अध्ययन पूरा किया जा चुका है, जिसमें इस क्षेत्र को ऊर्जा उत्पादन के अनुकूल पाया गया है। अब राज्य जल विद्युत निगम द्वारा इस स्थान पर जल्द ही प्रयोगात्मक ड्रिलिंग (एक्सप्लोरेटरी ड्रिलिंग) शुरू करने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है।
जियोथर्मल तकनीक के व्यावहारिक अध्ययन के लिए लद्दाख की पूगा घाटी में चल रहे देश के पहले भू-तापीय प्रोजेक्ट का दौरा किया जाएगा, जहां एक मेगावाट क्षमता का पावर प्लांट स्थापित किया जा रहा है। इसके साथ ही, वैश्विक स्तर पर जियोथर्मल ऊर्जा का शत-प्रतिशत और सफल इस्तेमाल करने वाले देश आइसलैंड में भी टीम को विशेष प्रशिक्षण के लिए भेजा जाएगा। आइसलैंड अपनी कुल बिजली आवश्यकता का करीब एक-तिहाई हिस्सा इसी ऊर्जा से प्राप्त करता है और वहां अधिकांश घरों को गर्म रखने के लिए भी इसी गर्म पानी की आपूर्ति की जाती है।
राज्य में इन परियोजनाओं को सुव्यवस्थित और पारदर्शी तरीके से आगे बढ़ाने के लिए ‘भू-तापीय ऊर्जा नीति-2025’ को लागू किया गया है। इस नीति के तहत ऊर्जा विभाग, उरेडा और जल विद्युत निगम को मुख्य कार्यान्वयन एजेंसियों के रूप में जिम्मेदारी सौंपी गई है। नीति में परियोजनाओं के आवंटन, सिंगल विंडो क्लीयरेंस, भूमि आवंटन और वित्तीय सहायता के स्पष्ट प्रावधान रखे गए हैं। इस पहल से न केवल राज्य की पारंपरिक बिजली पर निर्भरता कम होगी, बल्कि कार्बन उत्सर्जन में कमी लाकर दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को भी बढ़ावा मिलेगा।