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उत्तराखंड में भारी तबाही ला सकते हैं हैंगिंग ग्लेशियर! मॉनिटरिंग की जरूरत।

मध्य हिमालय में अस्थिर हैंगिंग ग्लेशियर के खतरे को लेकर एनजीटी ने मांगा जवाब

जलवायु परिवर्तन और लगातार बढ़ते तापमान की वजह से खासकर हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियर न सिर्फ पिघल रहे हैं, बल्कि उनके खिसकने या फिर टूटने की संभावना जताई जा रही है. जिसे देखते हुए हाल ही में एनजीटी यानी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने केंद्र सरकार समेत तमाम संस्थाओं से उत्तराखंड समेत अन्य हिमालय क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियर के खिसकने या फिर टूटने की जानकारी मांगी है.मध्य हिमालय क्षेत्र के पर्वतीय ढलानों पर मौजूद ये ग्लेशियर किसी बड़े हिमस्खलन और आपदा का कारण बन सकते हैं. हालांकि, उत्तराखंड में भी पहले इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं. साथ ही बर्फबारी के बाद अब हिमस्खलन की घटनाएं भी होती है. आखिर क्या है इसके पीछे की वजह, इससे बचाव और सावधानियां को लेकर क्या है हमारे पास विकल्प? वर्तमान समय में संवेदनशील क्षेत्रों की क्या है स्थिति? इससे आपको रूबरू करवाते हैं.

हैंगिंग ग्लेशियर से बड़ा खतरा: 

मध्य हिमालय के पर्वतीय ढलानों पर मौजूद हैंगिंग ग्लेशियर यानी लटके हुए ग्लेशियर (हिमनद) विनाशकारी हिमस्खलन (एवलॉन्च) और निचले क्षेत्रों में आपदाओं का एक बड़ा कारण बन सकते हैं. ऐसे में इन हैंगिंग ग्लेशियरों से होने वाले खतरे को लेकर  (एनजीटी) ने केंद्र सरकार समेत अन्य संस्थानों से जवाब मांगा है.

दरअसल, एनजीटी ने आधिकारिक तौर पर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, स्वच्छ गंगा राष्ट्रीय मिशन, उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड और राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान को नोटिस जारी किया है. साथ ही इन सभी को जवाब दाखिल करने को कहा है. क्योंकि, 6 अगस्त को इस मामले पर एनजीटी की सुनवाई होनी है.

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